अमौर की उदास सुबह और लोगों की उम्मीदें

समी खान की सीमांचल डायरी

पूर्णिया जिले के अमौर ब्लॉक में बुध की रात शाम साढ़े छह बजे ही शुरू हो गयी थी। लोगों ने बताया कि यहां हर रात इसी तरह से सवेरे शुरू हो जाती है। मैं जिस मोहल्ले में ठहरा था वहां के एक साहब ने बताया कि अमौर का सबसे पॉश इलाका मान सकते हैं। यहां से कुछ दूर भी देहात जाने के लिए आपको खराब सड़क की वजह से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

चहल-पहल या तो पार्टी के कार्यालयों में थी या ब्लॉक ऑफिस में। दुकानों में बत्तियां तो जल रही थीं लेकिन ग्राहक नदारद थे।

ब्लॉक ऑफिस में चुनाव कराने की तैयारी में लगे पुलिस अफसर और प्रखंड प्रशासन के लोग थे। गाड़ियां आ जा रही थीं। पार्टी ऑफिस में वैसे लोग तो कम थे लेकिन वहां का लाउडस्पीकर पूरी आवाज के साथ बज रहा था।

भारतीय जनता पार्टी से जदयू में आये सबा जफर यहां से उम्मीदवार हैं। उनके ऑफिस के बाहर हिन्दी और भोजपुरी में गाना बज रहा है। एक फिल्मी गाने की पैरोडी बज रही है- तीर के निशान पर।

सड़क पर ही एक चुनाव गाड़ी लगी हुई है जिस पर लिखा है – तरक्की दिखती है।
लेकिन जब आप यहां के लोगों से बात करेंगे तो उनका सबसे पहला सवाल ही होता है- तरक्की कहां है। स्कूल नहीं है, मेन सड़क को छोड़कर बाकी सारे रास्ते खराब हैं।

यहां से कुछ ही दूर आगे एआईएमआईएम का दफ्तर है। यहां के गीतों में उर्दू के बोल ज्यादा सुनने को मिलते हैं। तुम ऐसे रहबर को वोट देना, वतन को जो माहताब कर दे। और फिर जिंदाबाद के नारे।

रात भर बिजली ने साथ दिया। हालांकि इस वक्त पंखे की जरूरत नहीं थी। कमरे में गिरा एक पैम्फलेट मिला- मुखलिसाना गुजारिश। युवा एकता संगठन समिति, बारा ईदगाह। इसमें अमौर की बदहाली का जिक्र था। सीएए-एनआरसी की बात थी। इसमें यह लिखा था कि कैसे किसी पार्टी ने साथ नहीं दिया और सिर्फ अख्तरुल ईमान ने कंधा से कंधा मिलाकर साथ दिया। यह शिकायत भी थी कि अख्तरुल ईमान को छोड़कर डॉक्टर जावेद साहब को कांग्रेस के नाम पर कामयाब बनाया मगर जनता के साथ उनका जो व्यवहार है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

सुबह पांच बजे अजान की आवाज से नींद टूटी। अभी बन रही मस्जिद के बाहर मैंने सात जोड़ी चप्पलें देखीं तो इससे अंदाजा लगा कि बस इतने ही लोग मस्जिद में होंगे।

सुबह बोलती चिड़ियों और धान की बालियों के ऊपर गिरे शबनम के बीच टहलना काफी अच्छा लग रहा था।

जब लोग मस्जिद से बाहर निकले तो एक साहब घर जा चुके थे। बाकी 6 के बीच काफी जोरदार चर्चा थी चुनाव को लेकर। बहस में वह सारी बातें थी जो आमतौर पर पॉलिटिक्स पर बात करते हुए होती हैं और यहां तो दो दिन के बाद इलेक्शन होना है।

बस एक साहब थे जो कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान की तरफ से मोर्चा संभाले थे। उनके पास सबसे बड़ा हथियार यह था कि इस बार जब सरकार बदलेगी तो अब्दुल जलील मस्तान जी को मंत्री बनाया जाएगा। मगर उनसे सवाल करने वालों ने उनपर ताबड़तोड़ हमले किये कि चार बार एमएलए रहकर क्या कर लिया। उनकी दलील यह भी थी कि हम पार्टी को नहीं कैंडिडेट को वोट दे रहे।

अब ओवैसी के समर्थकों को सबसे बड़े सवाल का सामना था- आप लोग कहते हैं, बीजेपी कम्युनल है तो एमआईएम भी तो वही है।

आपको बीजेपी की सांप्रदायिकता पसन्द नहीं, ओवैसी की है। अब एक रक्षात्मक जवाब मिला- तो अरेस्ट क्यों नहीं करते। जवाब मिलता है- जबतक फायदा है तब तक नहीं करेंगे। फिर जवाबी सवाल- क्या फायदा है?

अब बहस गर्म हो रही थी। इसलिए लोग अपने काम बताकर अपने अपने घर की तरफ निकल गए।

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