छपी-अनछपीः जारी है जाति गणना पर मुख्यमंत्री की सफाई, इस्लामी देशों के संगठन पर भारत का सख्त बयान

बिहार लोक संवाद डाॅट नेट, पटना। बिहार में जातीय जनगणना कराये जाने के फैसले के कई दिन गुजरने के बाद भी इस बारे में सवाल थम नहीं रहे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सफाई दे रहे हैं।
पटना से छपने वाले सभी हिन्दी अखबारों के मंगलवार संस्करण में बाहर रहने वाले बिहारियों को भी जाति आधारित गणना में शामिल करने के नीतीश कुमार के बयान को लीड की जगह दी गयी है। जागरण की हेडिंग अलग है- किसी की उपेक्षा के लिए नहीं है जाति आधारित गणना।
पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के जवाब में मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया जारी है। एक दर्जन से अधिक मुस्लिम देशों के अलावा इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी ने भी अपनी प्रतिक्रिया में उन बयानों की निंदा की थी। ओआईसी ने भारत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की बात भी कही थी मगर भारत ने इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताते हुए सख्त संदेश देने की कोशिश की है। साथ ही पाकिस्तान को भी भारत ने उसके अपने देश में अल्पसंख्यकों की हालत पर आड़े हाथों लिया है।
जागरण ने इस खबर को अपने दूसरे पेज पर लीड की जगह दी है जिसकी हेडिंग है- भारत ने दुष्प्रचार करने पर ओआईसी और पाकिस्तान को लगाई फटकार।
प्रभात खबर में एक खास खबर है कि बिहार में हर साल लगभग बच्चों की गुमशुदगी की पांच हजार रिपोर्ट लिखवायी जाती है लेकिन इनमें से आधे ही वापस मिल पाते हैं। जिन जिलों से ज्यादा बच्चों की गुमशुदगी की खबर मिलती है उनमें पटना, गया, भागलपुर, सारण, गोपालगंज और रोहतास शामिल हैं। यहां से हर साल औसतन 200 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवायी जाती है।
हिन्दुस्तान ने खबर दी है कि बेहतर इलाज के लिए सिंगापुर जाना चाहते हैं लालू प्रसाद। चूंकि उनका पासपोर्ट कोर्ट में जमा है, इसलिए उन्हें इसके लिए कोर्ट में अर्जी देनी होगी।
अनछपीः हिन्दुस्तान ने ’संयम का समय’ शीर्षक से संपादकीय में लिखा है कि विवादित बयानों को लेकर खाड़ी देशों में जो रोष दिख रहा है, उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है, भारत सरकार ने समाधान की दिशा में सराहनीय कदम उठाया है। लेकिन इस संपादकीय में यह नहीं बताया गया है कि वह सराहनीय कदम क्या है? क्या पार्टी से निलंबन/निष्कासन भारत सरकार के कदम थे? क्या बयान जारी करना ही काफी है? भारत सरकार का कदम तो शायद यह होता कि वह कानून के हिसाब से दोषियों पर कार्रवाई कर उन्हें जेल भेजा जाता। इसी संपादीकय में यह दावा भी किया गया है कि भारत में मुसलमान सबसे सुरक्षित है। तो क्या बाकी देशों के मुसलमान भारत से कम सुरक्षित हैं? वैसे, यह दावा सरकार और सरकारी पार्टी करती है। मगर इस पूरे संपादकीय में जो बात सबसे आपत्तिजनक है वह यह है कि इसमें एक शब्द भी भारतीय मुसलमानों की भावना को ठेस पहुंचाने पर नहीं लिखा गया है। क्या भारतीय मुसलमानों की भावना को ठेस पहुंचाने को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है?

 

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