रिश्तों की वापसी

21वीं सदी की लोककथाएं-4
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बाज़ार से गुज़रते हुए शहज़ीन ने एक तरफ़ इशारा करते हुए कहा, ‘अब्बा वो बॉल देख रहे हैं?’
‘हां, वो रंग-बिरंगे बॉल।’ एक दुकान में ऊंचाई पर लटके हल्के-फुल्के बड़ेे-बड़े साइज़ के प्लास्टिक बॉल की तरफ़ मैंने देखा।
‘अब्बा, वो गुलाबी रंग वाला बॉल दिला दीजिये। आपको याद है ना, उसी बॉल से मैं खेल रही थी और आपने फ़िल्म की शूूटिंग की थी!’
मुझे याद आया। चार-पांच साल पहले की बात है। मैंने बच्चों के यौन शोषण पर एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई थी। उस फ़िल्म के एक किरदार के तौर पर मैंने शहज़ीन को पेश किया था और गुुलाबी रंग के बॉल के साथ एक मंज़र को शूट कराया था।
‘चलो, ले लो।’ शहज़ीन का हाथ पकड़े-पकड़े मैं दुकान की तरफ़ बढ़ गया।
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कई दिनों तक शहज़ीन और उसका बड़ा भाई शायान उस बॉल से खेलते रहे।
एक रोज़ शहज़ीन मेरे पास आकर रुआंसे अंदाज़ में बोली, ‘भैया लात मार-मार कर इस बॉल को खेल रहा था। देखिये, हवा निकल जाने की वजह से ये कितना छोटा हो गया।’
‘ये पैर से मारकर खेलने की चीज़ ही नहीं है।’ शायान की नासमझी पर मुझे भी झुंझलाहट हुई, ‘अच्छा छोड़ो, मैं दूसरा बॉल दिला दूंगा।’
‘नहीं, मुझे यही बॉल चाहिए।’ शहज़ीन अड़ गई, ‘भैया को बोलिये वो हवा भरके इसे पहले की तरह बड़ा करे।’
मेरे कहने पर शायान ने मुंह लगाकर बड़ी मेहनत से बॉल में हवा भरी। बॉल थोड़ा बड़ा हुआ तो जल्दी से उसपर टेप लगाया।
लेकिन थोड़ी देर बाद ही, धीरे-धीरे, बॉल से हवा निकलने लगी।
शहज़ीन तिलमिला कर मेरी पास आई, ‘ये तो फिर छोटा हो गया।’
‘इसे रहने दो, मैं दूसरा ला दूंगा।’
‘नहीं, मुझे यही चाहिए।’
‘ये ख़त्म हो गया है, ये अब पहले जैसा नहीं होगा।’ मैंने ज़ोर देकर शहज़ीन को समझाया।
वो झटके से मेरे पास से उठी और दूसरे कमरे में जाकर सिसकने लगी।
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हम अक्सर चीज़ों को उनकी पहले जैसी हालत में लाना चाहते हैं।
ख़ासकर उन चीज़ों को जिनसे हमारा जज़्बाती रिश्ता होता है।
हम जिस किसी शख़्स से जज़्बाती तौर पर जुड़े होते है, उसमें ज़रा-सी भी तब्दीली देखकर बेचैन हो जाते हैं। उस शख़्स को वापस पहले वाली हालत में लाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन वो शख़्स तो बदल चुका होता है। उसके जज़्बात बदल चुके होते हैं।
अब हम उस शख़्स के लिए अहमीयत नहीं रखते अलबत्ता वो हमारे लिए ज़रूर अहम होता है। इसीलिए हम उस शख़्स की, उस जज़्बे की, उस रिश्ते की वापसी चाहते हैं।
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हम महंगे, क़ीमती और ब्रांडेड सिमेंट से खूबसूरत-आलीशान इमारत बनाते हैं। उसमें आराम-व-आसाइश की च़ीजें सजाते हैं। फिर उसमें इत्मीनान से रहने लगते हैं।
लेकिन उसी सिमेंट के बोरे पर अगर पानी पड़ जाए तो वह पत्थर बन जाता है। उसकी हैसियत बदल चुकी होती है। उसका इस्तेमाल बदल जाता है।
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कुछ रिश्ते भी, किन्हीं वजहों से, बदल जाते हैं।
वे हमारे तईं जज़्बात से ख़ाली हो जाते हैं। पत्थर हो जाते हैं।
ऐसे रिश्तों की वापसी कभी नहीं होती।

-सैयद जावेद हसन
24 फ़रवरी, 2023

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