छ्पी-अनछपी: बिहार में क्राइम के मुद्दे पर एनडीए में घमासान, “आधार को ना मानना बेतुका”
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। बिहार में बढ़ते क्राइम के मुद्दे पर सरकार चला रहे एनडीए में घमासान मचा है और लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा है कि वह ऐसी सरकार को समर्थन देकर दुख महसूस कर रहे हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने कहा है कि एसआईआर में स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची में आधार और राशन कार्ड को शामिल न करना ‘बेहद बेतुका’ है।
और, जानिएगा कि बिहार के 75% युवा किस उम्र में शादी कर पा रहे हैं।
पहली ख़बर
जागरण के अनुसार लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के अध्यक्ष और केंद्रीय फूड प्रोसेसिंग मंत्री चिराग पासवान ने एक बार फिर नीतीश सरकार को घेरा है और दुख जताया है कि वह ऐसी सरकार को समर्थन दे रहे हैं जहां पर अपराध पूरी तरह अनियंत्रित हो चुका है। चिराग ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पूछा कि प्रशासन के रहते हुए कोई भी अपराधी राज्य में आपराधिक घटनाओं को कैसे अंजाम दे रहा है उन्होंने कहा कि एक के बाद एक आपराधिक घटनाओं में या तो प्रशासन की मिली भगत है या फिर इस पर लीपा पोती हो रही। प्रशासन पूरी तरह से निकम्मा हो चुका है और अब बिहार और बिहारी को सुरक्षित रखना इनको वर्ष का नहीं है। शनिवार को चिराग ने पटना में पत्रकारों से यह बात कही। चिराग ने कहा कि हत्या, लूट और दुष्कर्म जैसी घटनाओं की शृंखला बनती जा रही है।
चिराग पर जीतन राम मांझी का हमला
एनडीए में शामिल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि चिराग पासवान के पास राजनीतिक अनुभव कम है। चिराग द्वारा अपराध का मुद्दा उठाने के मामले में जीतन राम मांझी ने कहा कि बिहार में विधि व्यवस्था अभी वैसी नहीं है जैसी 2005 के पहले थी। जीतन राम मांझी ने दावा किया कि वर्ष 2005 के पहले अपराधी मुख्यमंत्री आवास में जाकर समझौता कर लिया करते थे। चिराग पासवान के अभी के बयान के बारे में जीतन राम मांझी ने कहा कि 2020 में भी चिराग ऐसा ही काम कर रहे थे। उन्होंने कहा कि एनडीए में रहकर इस तरह का बयान देना ठीक नहीं है। सीट शेयरिंग के लिए ऐसा दबाव उचित नहीं।
जदयू के नीरज बोले, मन बेचैन तो राजनीति बेचैन नहीं करनी चाहिए
इधर जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े का हवाला देते हुए दावा किया कि बिहार में आपराधिक घटनाओं में कमी आई है। उन्होंने कहा कि चिराग के वक्तव्य से स्पष्ट है कि वह केंद्र के आंकड़े से भी सहमत नहीं है। उन्होंने कहा कि जब मन जब बेचैन रहे तो राजनीति को बेचैन नहीं करना चाहिए। दिल में जब विकार रहेगा तो काफी दुख होगा। चिराग पुलिस की कार्यशैली पर टिप्पणी कर रहे लेकिन सुरक्षा उन्हें इस पुलिस की चाहिए। यह दोहरा मानदंड कैसे चलेगा?
आधार कार्ड को एसआईआर में शामिल न करना बेतुका: एडीआर
गैर राजनीतिक संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची में आधार और राशन कार्ड को शामिल न करना ‘बेहद बेतुका’ है। चुनाव आयोग ने अपने फैसले के लिए कोई वैध कारण नहीं बताया है। शीर्ष अदालत में दायर एक प्रतिउत्तर में संगठन ने कहा कि आधार कार्ड स्थायी निवास प्रमाण पत्र, ओबीसी/ एससी/एसटी प्रमाण पत्र और पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों में से एक है। संगठन ने कहा कि इससे तत्काल एसआईआर आदेश के तहत आधार (जो सबसे व्यापक रूप से प्रचलित दस्तावेज है) को चुनाव आयोग द्वारा अस्वीकार करना बेतुका हो जाता है।
अब पटना से ही होगा कृषि उत्पाद का निर्यात
बिहार के कृषि उत्पादों को निर्यात के लिए अब पटना से ही हरी झंडी मिल जाएगी। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) का क्षेत्रीय कार्यालय खोलने की मंजूरी केंद्र से मिल गई है। मीठापुर कृषि भवन परिसर के एनेक्सी भवन में जगह आवंटित कर दी गई है। जल्द ही इसका उद्घाटन होगा। एपीडा का क्षेत्रीय कार्यालय खुलने के बाद बिहार से कृषि निर्यात में वृद्धि होगी। अगले तीन साल में इसे तिगुना करने का लक्ष्य है। पहले वर्ष में 50 एफपीओ को ऑनबोर्ड किया जाएगा। 20 हजार किसानों को निर्यात संबंधी प्रशिक्षण दिया जाएगा। 10 पैक हाउस का प्रमाणन किया जाएगा।
बिहार के 75% युवा 28 की उम्र के बाद कर रहे शादी
हिन्दुस्तान के अनुसार युवाओं के लिए अब विवाह की प्राथमिकता उनके बेहतर कॅरियर के बाद आने लगा है। उसके लिए उच्च शिक्षा और कॅरियर की प्राथमिकता पहले है। इसके बाद ही वो विवाह के बंधन में बंधना चाहते हैं। तभी तो बिहार के 75 फीसदी युवा 28 के बाद ही शादी कर रहे हैं। यह बात राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अध्ययन में निकल कर आई है। यह अध्ययन मार्च 2024 से मार्च 2025 के बीच एक साल के वैवाहिक विज्ञापन पर किया गया है। इसमें देखा गया है कि स्नातक की डिग्री लेकर अब 15 से 20 फीसदी ही युवा और युवतियां विवाह के बंधन में बंध रहे हैं। अब चाहे बीटेक की डिग्री हो या फिर लॉ से स्नातक किए हो। सबसे ज्यादा 28 से 36 साल के बीच वाले युवा और युवतियां ही विवाह कर रहे हैं।
कुछ और सुर्खियां:
- एशिया कप क्रिकेट प्रतियोगिता में 14 सितंबर को भिड़ेंगे भारत और पाकिस्तान
- ईरान के सीस्तान और बलूचिस्तान प्रांत में बंदूकधारियों के हमले में नौ लोगों की मौत, तीन हमलावर भी मारे गए
- लालू प्रसाद के पुत्र और पूर्व राजद नेता तेज प्रताप ने महुआ से निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया
- पुराने मंदिर को लेकर थाईलैंड और कंबोडिया में लड़ाई जारी, 33 लोगों की मौत
अनछपी: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सुझाव पर सीबीएसई ने सभी संबद्ध स्कूलों को पहले से आठवीं क्लास में भी एनसीईआरटी की किताब पढ़ाने का जो निर्देश जारी किया है वह बहुत ही ज़ोर ज़बर्दस्ती वाला निर्देश है। इससे सीबीएसई स्कूलों पर सरकार की पकड़ जकड़न में बदल जाएगी और अपनी जरूरत के हिसाब से किताबें पढ़ाने की आजादी छीन ली जाएगी। अभी तक एनसीईआरटी की किताबों को नौवीं क्लास से ही जरूरी करार दिया गया था और पहली से आठवीं क्लास तक में इससे छूट मिली हुई थी। ध्यान रहे कि एनसीईआरटी ने सरकार के निर्देश पर अपनी किताबों में बहुत से विवादास्पद बदलाव लाए हैं, खासकर इतिहास की किताबों में तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने का आरोप लगा है जिसमें प्रमुख तौर पर मुगलों का इतिहास है। सवाल यह है कि एनसीईआरटी की किताबों को आठवीं तक ना पढ़ाने की मिली छूट आखिर वापस क्यों ली गई? दरअसल यह शिक्षा व्यवस्था पर एक खास विचारधारा को लादने की साज़िश का हिस्सा ही माना जाना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि सीबीएसई ने इसके बारे में नोटिफिकेशन तो पहले ही जारी कर दिया था लेकिन उस समय तक एनसीईआरटी की आठवीं तक की सभी विषयों की पुस्तक बाजार में ना आने से उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब कहा जा रहा है कि चूंकि एनसीईआरटी की आठवीं तक की सभी विषयों की पुस्तकें आ गई हैं तो सीबीएसई ने स्कूलों को इस पर अमल के निर्देश दिए हैं। यह निर्देश पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। दरअसल सीबीएसई पर सरकार का जैसा नियंत्रण है वह भी सही नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि अलग-अलग राज्यों में बच्चों को विशेष तौर पर सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में स्थानीय जानकारी भी देनी होती है जो एनसीईआरटी के किताबों में नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह राष्ट्रीय स्तर पर तैयार की जाती है। सीबीएसई का यह आदेश तानाशाही भरा है क्योंकि यह एक खास विचारधारा को ही बढ़ावा देने का प्रयास है और समाज के बाकी वर्गों की सोच को दबाने की चाल है। वैसे भी एनसीईआरटी आजकल ना तो समय पर अपनी किताबें छाप पा रहा है और ना ही बाजारों में उपलब्ध करा पा रहा है। सीबीएसई को अपना यह तुगलगी फरमान वापस लेना चाहिए और सिलेबस व किताबों के मामले में स्कूलों की स्वायत्तता पर कुठाराघात नहीं करना चाहिए। सीबीएसई को इसे एफीलिएशन देने की शर्त भी नहीं बनाना चाहिए और अगर वह ऐसा करता है तो इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए।
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