छ्पी-अनछपी: नीतीश की शपथ 20 को, राजपूत आबादी 3.45%-एमएलए 13% से ज़्यादा

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10वीं बार 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बिहार में इस बार 3.45 फ़ीसद आबादी वाले राजपूत समाज से 32 लोग विधानसभा चुनाव जीत कर आए हैं जो विधानसभा की क्षमता का 13% से ज़्यादा है। चुनाव में करारी हार के बाद लालू परिवार में पारिवारिक कल बढ़ गया है और रोहिणी आचार्य ने अपमान की शिकायत की है। भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव परिणाम को समझ से परे बताते हुए दो महीने पहले योजनाओं की घोषणा पर रोक लगाने की मांग की है।

पहली ख़बर

जागरण के अनुसार बिहार में एनडीए की प्रचंड जीत के बाद नीतीश कुमार रिकार्ड दसवीं बार 20 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। सोमवार को 11.30 बजे से कैबिनेट की बैठक होगी जिसमें सरकार के इस्तीफे का प्रस्ताव पास किया जाएगा। इसके बाद नीतीश कुमार राज्यपाल से मिलकर त्यागपत्र देंगे और नई सरकार के गठन का दावा पेश करेंगे। शपथ ग्रहण समारोह गुरुवार को ऐतिहासिक गांधी मैदान में होने की संभावना है। समारोह में पीएम नरेन्द्र मोदी भी शामिल होंगे। रविवार को 18वीं विधानसभा गठन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। बिहार में मुख्यमंत्री सहित कुल 36 मंत्री बन सकते हैं। जदयू से सीएम सहित 16 और भाजपा से दो डिप्टी सीएम सहित 16 मंत्री बनने की बात है। चर्चा यह भी है कि लोजपा (आर) से डिप्टी सीएम बन सकता है। भाजपा व जदयू के मंत्रियों की संख्या लगभग बराबर होगी। लोजपा (आर.) से 2 तथा हम व रालोमो से 1-1 मंत्री होंगे। सोमवार को पूर्वाह्न 11.30 बजे मौजूदा सरकार की कैबिनेट की आखिरी बैठक होगी।

आबादी से 4 गुना राजपूत विधायक

18वीं विधानसभा में इस बार 3.45 प्रतिशत आबादी वाली राजपूत जाति से 13% से अधिक यानी 32 उम्मीदवार जीत कर आए हैं। पिछली बार इनकी संख्या 18 थी। भूमिहार जाति की आबादी 2.86% बताई जाती है जबकि इसके विधायकों की संख्या 17 से बढ़कर 23 हो गई है। इसी तरह ब्राह्मणों की आबादी 3.65 बताई जाती है जबकि इसके विधायकों की संख्या 12 से बढ़कर 14 हो गई है। सवर्णों में केवल कायस्थ समाज से विधायकों की संख्या तीन से घटकर दो हुई है जिनकी आबादी 0.7 फ़ीसद है। हिन्दुस्तान के अनुसार लगभग आधे विधायक पिछड़ा-अति पिछड़ा समुदाय से हैं। कुल 243 विधायकों में 83 पिछड़ा वर्ग से हैं, जबकि अतिपिछड़ा श्रेणी के 37 विधायक सदन पहुंचने में कामयाब हुए हैं। वहीं सवर्ण समाज के विधायकों की संख्या 72 है। आरक्षित सीटों की संख्या 40 है। अल्पसंख्यक समुदाय से जीते विधायकों की संख्या मात्र 11 है, जिनमें एआईएमआईएम के ही पांच विधायक हैं। बिहार में सबसे अधिक आबादी वाली जाति यादव विधायकों की संख्या 55 से हटकर मात्र 28 रह गई है।

रोहिणी आचार्य ने अपमान की शिकायत की

प्रभात खबर के अनुसार राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के परिवार का अंतरकलह घर की चाहरदीवारी लांघ का बाहर आ गया है. रविवार को लालू प्रसाद के परिवार और राजनीति को अलविदा कहने के बाद रोहिणी आचार्य ने अपने फेसबुक पेज पर अपनी पीड़ा साझा की है. उन्होंने लिखा है कि सभी बेटी-बहन, जो शादीशुदा हैं, उनको मैं बोलूंगी कि जब आपके मायके में कोई बेटा-भाई हो, तो भूल कर भी अपने भगवान रूपी पिता को नहीं बचाएं. अपने भाई, उस घर के बेटे को ही बोलें कि वो अपनी या अपने किसी हरियाणवी दोस्त की किडनी लगवा दे. सभी बहन-बेटियां अपना घर-परिवार देखें, अपने माता-पिता की परवाह किए बिना अपने बच्चे, अपना काम, अपनी ससुराल देखें. सिर्फ अपने बारे में सोचें. रोहिणी ने लिखा, “मुझसे तो ये बड़ा गुनाह हो गया कि मैंने अपना परिवार, अपने तीनों बच्चों को नहीं देखा. किडनी देते वक्त न अपने पति, न अपने ससुराल से अनुमति ली. अपने भगवान, अपने पिता को बचाने के लिए वो कर दिया, जिसे आज गंदा बता दिया गया. आप सब मेरी जैसी गलती कभी ना करें. किसी के घर रोहिणी जैसी बेटी ना हो. कल मुझे गालियों के साथ बोला गया कि मैं गंदी हूं. मैंने अपने पिता को अपनी गंदी किडनी लगवा दी. करोड़ों रुपये लिये. टिकट लिया तब लगवायी गंदी किडनी.”

चुनाव परिणाम समझ से परे: दीपंकर

भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा है कि बिहार का चुनाव परिणाम उम्मीद और समझ से परे है। उन्होंने वर्ष 2010 का उदाहरण देते हुए कहा कि वह नीतीश कुमार के उभार का समय था लेकिन आज एक लड़खड़ाई हुई सरकार को इतना बड़ा बहुमत मिलना समझ से परे और शोध का विषय है। हिन्दुस्तान के अनुसार दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि चुनाव के दो महीने पहले नई योजना बनाकर पैसे बांटने पर रोक को लेकर नया कानून बनाना चाहिए। छह माह पहले तक कोई योजना की घोषणा नहीं हो। अगर ऐसा होता है तो उसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जाए। भट्टाचार्य रविवार को हड़ताली मोड़ के समीप स्थित विधायक आवास पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बातें कही। उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव के परिणाम को लेकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव से बातचीत हुई है। महागठबंधन स्तर पर बैठक कर हार के कारणों की समीक्षा होगी। उन्होंने बताया कि चुनाव में उतरे सभी उम्मीदवारों की आज बैठक हुई है। 18 से 24 नवंबर तक जीते-हारे सभी उम्मीदवार जनता के बीच रहकर सघन जनसंपर्क और जनसंवाद अभियान चलाएंगे।

कुछ और सुर्खियां:

  • बिहार से चुनावी आचार संहिता खत्म, चुनाव आयोग ने सभी नवनिर्वाचित विधायकों की सूची राज्यपाल को सौंपी
  • छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सुरक्षा कर्मियों के साथ मुठभेड़ में दो महिला समेत तीन नक्सलियों की मौत
  • दक्षिण अफ्रीका से 15 साल बाद घर में टेस्ट हारा भारत, कोलकाता में मेजबान टीम 30 रन से जीती
  • अभिनेत्री नीतू चंद्रा को चुनाव आइकॉन पद से हटाया गया

अनछपी: 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव कि जब भी चर्चा होगी तब वोट चोरी की बात भी याद आएगी लेकिन इससे आगे भी सोचने की जरूरत है। वह जरूरत यह है कि लोकतंत्र में आपका समर्थन बढ़े तब भी आप हार सकते हैं क्योंकि आपके प्रतिद्वंद्वी का समर्थन आपसे ज्यादा बढ़ा हुआ हो सकता है। इसलिए जब इस बार मतदान का प्रतिशत बहुत बढ़ गया तो बहुत से लोगों ने इसका नतीजा यह निकला कि यह महागठबंधन के पक्ष में गया है। काफी हद तक यह बात सही भी निकली लेकिन आंकड़ों से जो बात साबित होती है वह यह है कि बड़े हुए मतदाता महागठबंधन से ज्यादा एनडीए के समर्थन में वोट डालने गए थे। एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में महागठबंधन का प्रति सीट औसत वोट 64,574 था, जबकि इस बार इसमें तकरीबन 11 हजार की बढ़ोत्तरी प्रति सीट हुई है। अबकी औसत वोट बढ़कर 75,581 हो गया है। वहीं, 2020 में एनडीए का औसत वोट 64,619 था जो इस बार बढ़कर 96,156 हो गया। एनडीए की प्रति सीट औसत वोट में करीब 32 हजार का ‘इजाफा हुआ। पिछली बार महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, भाकपा माले, भाकपा, माकपा शामिल थे, जबकि एनडीए में भाजपा, जदयूं, हम और वीआईपी शामिल थे। वहीं, इस बार इस समीकरण में परिवर्तन हुआ। राजद ने 142 सीटों पर 1,15,46,055 यानी 23% हासिल किए लेकिन वह केवल 25 सीटों पर जीत सका। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने 101 सीटों पर एक करोड़ 81143 यानी 20.08 प्रतिशत वोट हासिल कर 88 सीटें जीतीं। इसी तरह जेडीयू ने 101 सीट पर 96 लाख 67118 यानी 19.25% वोट लेकर 85 सीटें जीतीं। तो यह कहा जा सकता है कि राजद ने अपना समर्थन नहीं खोया लेकिन वह अपना समर्थन इस हद तक नहीं बढ़ा सका कि भाजपा और जदयू को मात दे सके और यही वजह है कि वह तीसरे नंबर की पार्टी बनी और काफी अंतर से नीचे रहा। इसके अलावा यह बात भी समझने की है कि पूरे राज्य में वोट हासिल करना और विधानसभा के लिहाज से वोट हासिल कर जीत हासिल करने में काफी फर्क है।

 

 

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