छ्पी-अनछपी: भागलपुर और सीमांचल में बाढ़ से आफत, तिब्बी कॉलेज में फर्जीवाड़ा!

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। बाढ़ की वजह से भागलपुर विश्वविद्यालय कैंपस समेत पांच जगहों पर शहर में नावें चल रही हैं और यही हाल सीमांचल की कुछ जगहों का है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में पटना के गवर्नमेंट तिब्बी कॉलेज अस्पताल में मरीजों की भर्ती को लेकर फर्जीवाड़े का आरोप लगाया गया है। 

और, जानिएगा कि पाकिस्तान क्रिकेट एक बार फिर मैच फिक्सिंग के साये की वजह से चर्चा में है।

पहली ख़बर

प्रभात खबर के अनुसार राज्य में बाढ़ से 13 जिलों के 28.13 लाख लोग प्रभावित हैं, हालांकि, बक्सर, भोजपुर व पटना में गंगा नदी का उफान अब कम होने लगा है. इससे अगले कुछ दिनों में स्थिति के अधिक सामान्य होने की उम्मीद है. लेकिन, दूसरी ओर भागलपुर की ओर डाउनस्ट्रीम में पानी बढ़ने से स्थिति और खराब हो गयी है. जल संसाधन विभाग के अनुसार, सोमवार की दोपहर दो बजे तक गंगा के जल स्तर में मनेर में 12 सेंटीमीटर, दीघा घाट पर 21 सेंटीमीटर, गांधी घाट पर 15 सेंटीमीटर व हथिदह में चार सेंटीमीटर कमी दर्ज हुई. हालांकि, इसके बावजूद इन जगहों पर गंगा अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. लेकिन, यहां पानी घटने की यह प्रवृति बने रहने की संभावना है. वहीं, दूसरी ओर अपस्ट्रीम में जल स्तर में रिकॉर्ड वृद्धि का प्रभाव डाउनस्ट्रीम में भागलपुर जिले में दिखने लगा है. सोमवार सुबह 10 बजे सुल्तानगंज में गंगा नदी का पानी उच्चतम जलस्तर 36.75 मीटर से मात्र तीन सेंटीमीटर नीचे रह गया है. वहां एक सेंटीमीटर प्रति घंटे की दर से वृद्धि हो रही है. भागलपुर शहर में पांच मुहल्लों में नावें चल रही हैं.

कई आबादी वाले इलाके में चल रही है नाव

कोसी-सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में बाढ़ ने विकराल रूप धारण कर लिया है. कोसी व सीमांचल में जलप्रवाह घटने के बावजूद पीड़ितों की समस्याएं बनी हुई हैं, वहीं पूर्वी बिहार में गंगा नदी रौद्र रूप में है. मुंगेर, लखीसराय और भागलपुर के 60 से अंधिक स्कूलों में पढ़ाई ठप हो गयी है.भागलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज और शहरी क्षेत्र के कई कॉलेजों में पानी प्रवेश कर चुका है. टीएमबीयू कैंपस सहित शहर के पांच मोहल्लों में नावें चल रही हैं. पूर्णिया के अमौर प्रखंड स्थित तियारपारा पंचायत के आसियानी घाट पर पुल टूट जाने से आवागमन ठप हो गया है. यहां प्रशासन द्वारा सरकारी नाव का परिचालन शुरू किया गया है.

सरकार का दावा मदद का लेकिन परेशानी बरकरार

भास्कर के अनुसार बिहार में 13 जिलों में 27 लाख लोग बाढ़ से घिरे हुए हैं। सरकार इन पीड़ितों के लिए राहत शिविर और मदद पहुंचाने की मुकम्मल व्यवस्था करने का दावा कर रही है पर जमीनी हकीकत काफी अलग है। इन राहत शिविरों में दोनों वक्त दाल-भात-सब्जी तो मिल रही है, मगर बच्चों के लिए दूध, महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड व चेंजिंग रूम और मवेशियों के चारे का भारी संकट है। कई जिलों में राहत रसोई केवल कागजों तक ही सीमित है। पटना के दीघा मीनार घाट और जेपी गंगा पथ कैंप में भोजन-पानी तो मिल रहा है पर बच्चों को दूध-बिस्कुट और महिलाओं को सैनिटरी पैड नहीं मिल रहे हैं। मनेर के महिनावा में महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम नहीं है। पशुओं का चारा सोमवार को ही खत्म हो गया। फुलवारी के धनकी में नियमित जांच न होने से बुजुर्ग और गंभीर मरीज बेहाल हैं। बाढ़ अनुमंडल के कैंप में बने 5 शौचालयों में सफाई की भारी कमी है। सारण के 7 प्रखंडों के 109 गांवों में 2.12 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। जान टोला, रावल टीला और सीढ़ी घाट में शिशुओं के लिए दूध और महिलाओं के लिए टॉयलेट नहीं हैं। समस्तीपुर के मोहिउद्दीननगर में स्वीकृत 65 में से धरातल पर महज 5 रसोइयां चल रही हैं। भागलपुर के नाथनगर के 5 शिविरों में पशुपालक अपने खर्च पर चारा खिलाने को मजबूर हैं। सीवान में 164 रसोई प्रस्तावित हैं, पर जलस्तर बढ़ने के इंतजार में एक भी चालू नहीं हुआ। गोपालगंज और बक्सर के सिमरी में एक भी स्वीकृत राहत शिविर या रसोई चालू नहीं हो सकी है। सिमरी में 15 केंद्रों में से सब बंद है।

तिब्बी कॉलेज में मरीज़ फर्जीवाड़ा!

प्रभात खबर के अनुसार राजधानी पटना के राजकीय तिब्बी कॉलेज व अस्पताल में फर्जी मरीजों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है. इस मामले का खुलासा तब हुआ, जब राज्य आयुष समिति के कार्यपालक निदेशक सह स्वास्थ्य विभाग के अपर सचिव वैभव चौधरी ने अस्पताल और कॉलेज का औचक निरीक्षण किया. निरीक्षण के दौरान जब रजिस्टर चेक किया गया तो कई ऐसे मरीज मिले, जो एक साल से अस्पताल में भर्ती थे. वहीं, कई मरीजों की जानकारी इंट्री रजिस्टर में दर्ज नहीं थी, लेकिन वे बेड पर भर्ती पाये गये. निरीक्षण के दौरान कॉलेज और अस्पताल में कई कमियां सामने आयीं. इसके बाद अस्पताल और कॉलेज प्रशासन को व्यवस्था में सुधार के निर्देश दिये गये हैं. वहीं दूसरी ओर इस मामले की सच्चाई का पता लगाने के लिए प्रभात खबर ने भी सोमवार को वार्ड की पड़ताल की, तो कई मरीज छह माह से भर्ती मिले. इस बारे में अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर शाहनवाज अख्तर का कहना है कि फर्जी मरीज भर्ती की बात जो कही जा रही है वह गलत है क्योंकि यूनानी चिकित्सा पद्धति में लंबा इलाज चलता है इसलिए मरीज कई माह से भर्ती है। क्लास नहीं चलने के बारे में उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रिंसिपल जिम्मेदार होते हैं। 

कोर्ट ने कहा- नोएडा की डीएम का आचरण निंदा योग्य, 5 लाख का जुर्माना

भास्कर की ख़बर है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत रद्द करते हुए नोएडा की डीएम मेधा रूपम और पुलिस की कार्यशैली पर बेहद सख्त टिप्पणी की। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने चेतावनी दी कि अधिकारियों का ऐसा निरंकुश रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ (तानाशाही सरकार) बनने में देर नहीं लगेगी। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की रिपोर्ट में ठोस सामग्री नहीं थी, फिर भी डीएम ने एनएसए जैसी कड़ी कार्रवाई की। बेंच ने डीएम के आचरण को निंदा के योग्य बताया और कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि छात्रा को ‘मिसाल’ बनाने की कोशिश की गई। जब अफसर शपथ भूलकर नागरिकों के अधिकारों के खिलाफ काम करते हैं तो जनता उन्हें ‘ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष’ के रूप में देखने लगती है। कोर्ट ने कहा, अभिव्यक्ति की आजादी में सड़कों पर उतरना शामिल है। केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर प्रदर्शन रोकना उचित नहीं है। कोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपए मुआवजा देने और यह रकम डीएम की सैलरी से वसूलने का आदेश दिया। 

पाकिस्तान क्रिकेट एक बार फिर मैच फिक्सिंग के साये की वजह से चर्चा में 

जागरण के अनुसार पाकिस्तान क्रिकेट में नए तरीके से पुरानी फिक्सिंग वाली कहानी फिर से दोहराई जाती दिख रही है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने सोमवार को कहा कि इंग्लैंड के मौजूदा दौरे के दौरान अनुशासन तोड़ने की बढ़ती मीडिया अटकलों के बीच उसने एक आंतरिक जांच शुरू की है। हालांकि इस बयान में किसी घटना या व्यक्ति का जिक्र नहीं था लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेटरों के फिक्सिंग में शामिल होने का संदेह जताया गया है। पीसीबी के मीडिया निदेशक हामिद मीर ने कहा कि अनुशासन और व्यवहार से जुड़ी मीडिया रिपोटौँ के बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने एक आंतरिक अनुशासनात्मक जांच शुरू की है, जिसकी अभी आंतरिक रूप से समीक्षा की जा रही है। पीसीबी ऐसे मामलों को अपनी मानक प्रक्रिया के अनुसार संभालता है। यह प्रक्रिया पीसीबी के नियमों के तहत की जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी संबंधित व्यक्तियों पर उचित ध्यान दिया जाए। 

कुछ और सुर्खियां:

  • राजस्थान के बगड़धाम से उत्तर प्रदेश के बदायूं लौट रहे श्रद्धालुओं की गाड़ी गूगल मैप देखकर यू टर्न लेते समय दूसरी गाड़ी से टकराई, 12 लोग मरे
  • झारखंड के कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा पेपर लीक मामले में पटना का कारोबारी राजन कुमार गिरफ्तार
  • घरेलू रसोई गैस की बुकिंग अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी 25 दिनों में हो सकेगी, पहले 45 दिन में हो रही थी
  • टीएमसी के राज्यसभा सांसद नदीम उल हक के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में रांची में ईडी की छापेमारी
  • दिल्ली में इमारत गिरने से मरने वालों की संख्या बढ़कर सात हुई, इमारत मलिक पत्नी- बेटे सहित गिरफ्तार
  • पुनपुन में बाढ़ की वजह से पटना और गया के बीच चलने वाली 10 पैसेंजर ट्रेन आज भी रद्द रहेंगी

अनछपी: अखबारों में और दूसरे मेनस्ट्रीम कहलाने वाले मीडिया में खबरों को कैसे दबाया जाता है, इसकी एक मिसाल आज फिर देखने को मिली जब उत्तर प्रदेश के नोएडा जिले की डीएम के बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों और उन पर लगाए गए पांच लाख रुपये के जुर्माने की खबरों को या तो नहीं छापा गया या ऐसी जगह छापा गया जिस पर नजर मुश्किल से जाए। इसी तरह असम में भी सरकार पर वहां के हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला को जबरदस्ती बांग्लादेश भेजने के मामले में दो लाख का जुर्माना लगाया लेकिन उसकी भी खबर हिंदी अखबारों में नहीं दिखी। यहां याद रखने की बात यह है कि उत्तर प्रदेश और असम में डबल इंजन की सरकार है यानी भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में विरोधियों को दबाने का जो निर्मम  तरीका वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनाया है उसके बाद प्रशासनिक अधिकारी मजबूरी में या जानबूझकर ऐसी कार्रवाई कर रहे हैं जिस पर कभी-कभी कोर्ट की सख्त टिप्पणी सामने आती है तो मीडिया में उसे बिल्कुल दबा दिया जाता है। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति को जिस तरह नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनी यानी एनएसए के तहत जेल में डाला, वह अगर उनकी मजबूरी नहीं है तो यह दर्शाती है कि उनकी मानसिकता में कितनी तानाशाही है। ध्यान रहे कि मेधा रूपम इसलिए भी चर्चित हैं क्योंकि उनके पिता ज्ञानेश कुमार भारत के मुख्य निर्वाचन अधिकारी हैं जो अपनी तानाशाही भरी गतिविधियों के लिए बदनाम माने जाते हैं। एक ऐसे समय में जबकि सरकारों को बेहद निरंकुश पाया जाता है और कानून कायदे की धज्जियां सरकार द्वारा ही उड़ाई जाती हैं तो कभी-कभी कोर्ट के ऐसे फैसलों से बड़ी उम्मीद जगती है।

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