छ्पी-अनछपी: क्या सऊदी दबाव में अमेरिका ने ख़ामेनई को मारा, ईरान का इंतक़ाम जारी

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। अमेरिका की मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप पर दबाव डाला जिसके बाद ईरान के सुप्रीम लीडर को मारने की कार्रवाई की गई। ईरान ने इंतक़ाम में अमेरिकी बेसों और इसराइल के शहरों पर हमला किया। अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान में 23 लोग मारे गए।

पहली ख़बर

हिन्दुस्तान के अनुसार ईरान से वार्ता के बीच अचानक अमेरिका द्वारा किए गए हमले को लेकर एक चौंकाने वाला दावा किया गया है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने ट्रंप पर हमले का दबाव बनाया था। इस रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रंप कूटनीतिक तरीके से समस्या का हल चाहते थे, सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने उन्हें कई बार फोन किया। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने ईरान पर हमला करने का फैसला तब लिया जब सलमान ने उन पर हमला करने का दबाव बनाया। मीडिया रिपोर्ट में ट्रंप के करीबी चार सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया कि क्राउन प्रिंस ने बीते महीने ट्रंप को कई प्राइवेट फोन किए, वह हमलों पर जोर दे रहे थे। उधर, इसराइल भी अमेरिका पर पूरी तरह दबाव बनाए हुए थे। इस प्रेशर में ट्रंप ने हमलों को हरी झंडी दे दी।

ईरान के इंतक़ाम से दुनिया भर में कोहराम

अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने इंतकाम लेने के लिए इजरायल, यूएई सहित मध्यपूर्व के नौ देशों पर मिसाइलों की बौछार कर दी। इजरायल और अमेरिका ने भी इसके जवाब में ताबड़तोड़ बमबारी की। यूएई ने भी ऐलान कर दिया कि वह चुप नहीं रहेगा। ईरान ने रविवार को अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा हवाई अड्डों, होटलों और इमारतों को निशाना बनाया, जिसमें जानमाल के भारी नुकसान की खबर है। इस युद्ध का सभी क्षेत्रों पर असर पड़ा है। ईरान द्वारा छोड़ी गई मिसाइलों और ड्रोन के कारण दुबई, कुवैत और कतर जैसे देशों में हवाई यातायात बाधित हुआ। 

नाटो के कई देशों ने ट्रंप से बनाई दूरी

भास्कर के अनुसार ईरान पर अमेरिका-इसराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद नाटो के देशों का रुख अमेरिका से अलग दिख रहा है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे प्रमुख नाटो देशों ने हमले से दूरी बनाई। स्पेन-नॉर्वे ने तो कार्रवाई की वैधता पर ही आपत्ति जताई। हालांकि, कनाडा व ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन किया। इतिहास में पहली बार अमेरिका के खिलाफ ईरान-इराक साथ आ गए हैं। फ्रांस कार्रवाई में शामिल नहीं था। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तनाव कम करने और परमाणु वार्ता को फिर शुरू करने पर जोर दिया। जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्स ने भी स्पष्ट किया कि जर्मनी ने हमले में भाग नहीं लिया और सभी पक्षों से संयम बरतने तथा कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील की।

हमले की टाइमिंग बदली गई थी

प्रभात खबर के अनुसार ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगियों के निशाने पर थे. अंततः एक गुप्त सैन्य अभियान में उनकी मौत हो गयी. इस ऑपरेशन में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए की निर्णायक भूमिका रही. एजेंसी कई महीनों से खामेनेई की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था और आवाजाही के पैटर्न पर बारीकी से नजर रख रही थी. धीरे-धीरे उनके ठिकानों, बैठकों और दैनिक कार्यक्रमों का विस्तृत खाका तैयार कर लिया गया, जिसने इस अभियान को संभव बनाया. खुफिया निगरानी के दौरान सीआइए को एक अहम जानकारी मिली कि शनिवार की सुबह तेहरान के एक प्रमुख सरकारी परिसर में ईरान के शीर्ष नेताओं की उच्चस्तरीय बैठक होने वाली है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस बैठक में खामेनेई भी मौजूद रहने वाले थे. एजेंसी ने इस जानकारी को ‘हाइ फिडेलिटी’ यानी पूरी तरह भरोसेमंद बताया और इसे तुरंत इसराइल के साथ साझा किया. यही इनपुट बाद में पूरे ऑपरेशन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ.योजना के अनुसार अमेरिका और इस्राइल रात के अंधेरे में हमला करने वाले थे. लेकिन जैसे ही यह पता चला कि राष्ट्रपति कार्यालय, सर्वोच्च नेता का दफ्तर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारी एक ही परिसर में एक साथ मौजूद रहेंगे, रणनीति बदल दी गयी. अब लक्ष्य था कि एक ही हमले में अधिकतम नेतृत्व को निशाना बनाया जाये. इसी वजह से हमले का समय बदलकर शनिवार सुबह तय किया गया.

पाकिस्तान में अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन, 23 लोग मारे गए

इसरायली-अमेरिकी हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत की पुष्टि होने के बाद रविवार को पाकिस्तान के कई शहर जल उठे। कराची में हजारों प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी कॉन्सुलेट में घुसने का प्रयास किया और आगजनी की। कई शहरों में हुए प्रदर्शन में 23 लोग मारे गए। कराची में 10, पाकिस्तान के कब्जे वाले स्कार्दू शहर में 11 और इस्लामाबाद में दो लोगों की मौत हुई। अलग-अलग शहरों में करीब 50 लोगों के घायल होने की खबर है। प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी दूतावास के मुख्य द्वार पर भारी वस्तुओं, लोहे की रॉड आदि से हमला कर गेट तोड़ दिया। भीड़ परिसर के अंदर घुसने का प्रयास करने लगी। इस दौरान भवन पर पेट्रोल बम भी फेंके गए, जिससे इमारत के कुछ हिस्सों में आग लग गई। इस्लामाबाद में अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास के एक अधिकारी ने कहा, हम कराची, लाहौर में अमेरिकी कॉन्सुलेट के बाहर चल रहे प्रदर्शनों पर नजर रख रहे हैं।

भारत में भी शोक, प्रदर्शन

देशभर में शिया बहुल इलाकों में सैकड़ों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्वक सड़कों पर मार्च निकाला और अमेरिका तथा इजरायल विरोधी नारे लगाए। उधर, लुधियाना में पंजाब के शाही इमाम मौलाना मोहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने खामेनेई की हत्या के विरोध में विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने भारत सरकार से यह भी मांग की कि सुप्रीम लीडर के लिए एक हफ्ते का राष्ट्रीय शोक मनाया जाए। महिलाओं समेत बड़ी संख्या में मुसलमान विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए यहां ऐतिहासिक फील्ड गंज मस्जिद के बाहर इकट्ठा हुए। वहीं, हैदराबाद में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हत्या के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। खामेनेई की मौत पर लखनऊ, कानपुर, बरेली, आगरा, मेरठ और प्रयागराज समेत यूपी के कई जिलों में शिया समुदाय के लोगों में भारी आक्रोश दिखा। 

सीओ-आरओ कलम बंद हड़ताल पर आज 537 अंचलों में काम ठप

भास्कर के अनुसार बिहार के सभी 38 जिलों के 537 अंचलों में सोमवार को लोगों के जमीन संबंधी कोई काम नहीं होंगे। सीओ/आरओ दिन भर कलम बंद हड़ताल पर रहेंगे। भास्कर के अनुसार राजस्वी कर्मचारी बीते 11 फरवरी से ही हड़ताल पर हैं। अंचल कार्यालयों का पूरा दारोमदार इन 3-अधिकारी-कर्मियों पर ही रहता है। होली बाद शुक्रवार से सभी अंचल कार्यालयों में काम पूरी तरह ठप होने के आसार हैं। एक तरफ राजस्व कर्मियों की हड़ताल 19 दिनों से जारी है तो सीओ और आरओ ने भी शुक्रवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है। सीओ-आरओ ने सरकार पर समझौता लागू नहीं करने का आरोप लगाया है तो राजस्व कर्मियों ने 9 महीनों से समझौता होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया है। बिहार राजस्व सेवा संघ के अध्यक्ष आनंद कुमार ने कहा कि यह लड़ाई संवर्गीय अस्तित्व की है। बिहार राज्य भूमि सुधार कर्मचारी संघ संयुक्त संघर्ष मोर्चा के सचिव राहुल ने कहा कि ‘हमारी योग्यता कम से कम “स्नातक” है। पर सरकार सुध नहीं ले रही।

कुछ और सुर्खियां:

  • महाराष्ट्र के नागपुर जिले में विस्फोटक पदार्थ बनाने वाले एक कारखाने में  धमाके में 18 लोगों की मौत
  • वेस्टइंडीज को हरा भारत टी 20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में, पांच मार्च को मुंबई में इंग्लैंड से होगा मुक़ाबला
  • वैशाली जिले में सेप्टिक टैंक में एक किशोर के गिरने के बाद उसे बचाने उतरे तीन लोग, चारों की दम घुटने से मौत
  • कैमूर जिले के कुदरा थाना क्षेत्र में ट्रक में बस में मारी टक्कर, एक बच्चे समेत तीन यात्रियों की मौत
  • पटना से गल्फ जाने वाले डेढ़ सौ लोगों ने एयर टिकट रद्द कराया

अनछपी: ईरान के रहबर-ए-मोज़ज़्म या सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के इसराइल और अमेरिका के हमले में मारे जाने के बाद सऊदी अरब के शहजादा मोहम्मद बिन सलमान के रोल के बारे में जो मीडिया रिपोर्ट्स आई हैं उन्हें बहुत सावधानी से समझने की कोशिश करने की जरूरत है। मोहम्मद बिन सलमान के बारे में यह दावा कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव डाला इसलिए ख़ामेनई को मार दिया गया, अमेरिका और इसराइल की एक कुटिल चाल भी हो सकती है ताकि ईरान के गम व गुस्से का रुख उनपर से हटकर सऊदी अरब की तरफ हो जाए। यह बताने याद रखने की है कि जंग केवल हथियारों से नहीं बल्कि इस तरह की दुश्मनी फैलाने वाली खबरों को प्लांट कर भी लड़ी जाती है। एक दूसरी राय यह भी हो सकती है कि मोहम्मद बिन सलमान का कैरैक्टर इस तरह का रहा है कि उन्होंने अगर वाकई ऐसा किया है तो यह मुमकिन है। ऐसे में होना तो यह चाहिए कि मोहम्मद बिन सलमान को इस खबर के बारे में अपना स्टैंड बताना चाहिए। लेकिन यह उम्मीद इसलिए बेकार है क्योंकि वह इसके लिए जाने नहीं जाते। मोहम्मद बिन सलमान इस्लाम की खातिर कुछ सोचते होंगे, ऐसा मानने वाले दुनिया में बहुत कम लोग होंगे। जिस तरह मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब में गैर इस्लामी संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश की है, उससे उनके बारे में शक हमेशा बना रहेगा। अभी यह पता नहीं की ईरान के सुप्रीम लीडर पर अमेरिकी और इसराइल के हमले में सऊदी अरब ने अपने इलाके का इस्तेमाल होने दिया या नहीं, लेकिन अभी जो हालात हैं उनसे यही लगता है कि अमेरिका के आगे इतनी सऊदी अरब इतनी हिम्मत शायद ही दिखा पाए। वैसे बात केवल सऊदी अरब की नहीं बल्कि खाड़ी के सभी मुस्लिम देशों का यही हाल माना जा रहा है। 

 166 total views

Share Now

Leave a Reply