छ्पी-अनछपी: रसोई गैस का नया कनेक्शन बंद, ईरान ने अमेरिकी दूतावास पर रॉकेट दागा
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। बिहार में नये गैस कनेक्शन (एनसी) और डबल बॉटल कनेक्शन (डीबीसी) जारी करने पर अस्थायी रोक लगा दी गयी है. ईरान ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में रॉकेट और मिसाइल से हमला कर पूरे इलाके को दहला दिया। उत्तर प्रदेश के संभल में मस्जिद में नमाज़ियों की तादाद पर हद लगाई तो कोर्ट बोला- एसपी-डीएम व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो इस्तीफा दें।
और जानिएगा कि सुप्रीम कोर्ट के नौ जज इसकी परिभाषा तय करेंगे कि इंडस्ट्री क्या है।
पहली ख़बर
प्रभात ख़बर के अनुसार एलपीजी की बढ़ती मांग और आपूर्ति पर बढ़ रहे दबाव को देखते हुए फिलहाल नये गैस कनेक्शन (एनसी) और डबल बॉटल कनेक्शन (डीबीसी) जारी करने पर अस्थायी रोक लगा दी गयी है. अगली सूचना तक इन दोनों श्रेणियों में कोई भी कनेक्शन जारी नहीं किये जायेंगे. यह फैसला मौजूदा उपभोक्ताओं को समय पर गैस उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लिया गया है, ताकि एलपीजी वितरण व्यवस्था सामान्य बनी रहे. बिहार एलपीजी वितरक संघ के महासचिव डॉ रामनरेश प्रसाद सिन्हा ने बताया कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए तेल कंपनियों की ओर से यह फैसला लिया गया है. उन्होंने कहा कि प्राथमिकता मौजूदा उपभोक्ताओं को समय पर गैस सिलिंडर उपलब्ध कराने पर दी जा रही है. साथ ही शहरी इलाकों में 12 और ग्रामीण इलाकों में आठ सिलिंडर के बाद बुकिंग पर भी ब्रेक लग गयी है. वहीं, गैस कनेक्शन ट्रांसफर पर भी रोक लग गयी है.
ईरान ने बगदाद के अमेरिकी दूतावास पर रॉकेट दागा
हिन्दुस्तान के अनुसार अमेरिका ने ईरान पर हमले तेज कर दिए हैं। अमेरिकी सेना ने शुक्रवार देर रात फारस की खाड़ी में ईरान के खार्ग द्वीप मिसाइल और बम से हमला किया। इस दौरान ईरान के 90 से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान इस द्वीप का इस्तेमाल तेल भंडारण के लिए करता है। हमले के जवाब में ईरान ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में रॉकेट और मिसाइल से हमला कर पूरे इलाके को दहला दिया। अमेरिकी सेना ने बताया कि सैन्य कार्रवाई में ईरानी नौसेना के बारुदी सुरंग और मिसाइल भंडार के साथ कई सैन्य ठिकानों को मिसाइल और बम से पूरी तरह तबाह कर दिया गया। अमेरिकी सेना ने इस कार्रवाई में ईरान के तेल ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। हमले के बाद ईरान ने बयान जारी कर बताया कि अमेरिका ने सिलसिलेवार हमला किया और 15 से अधिक धमाके सुने गए।
ट्रंप ने होर्मुज के लिए चीन से मदद मांगी
भास्कर के अनुसार अमेरिका-ईरान में जंग को 15 दिन हो चुके हैं, लेकिन इसके जल्द थमने के आसार नहीं दिख रहे। ईरान ने ‘लंबे थकाऊ युद्ध’ की रणनीति से अमेरिका पर भारी दबाव बना दिया है। हालात ये हैं कि अमेरिका को होर्मुज जलमार्ग खुला रखने के लिए चीन समेत कई देशों से मदद मांगनी पड़ रही है। ट्रम्प ने शनिवार को टूथ सोशल पर लिखा- ‘कई देश, खासकर वे जो ईरान की ओर से होर्मुज जलमार्ग को बंद करने की कोशिश से प्रभावित हैं, अमेरिका’ के साथ मिलकर इस मार्ग को सुरक्षित और खुला रखने के लिए युद्धपोत भेजें।’ ट्रम्प ने उम्मीद जताई कि अन्य प्रभावित देश भी इस क्षेत्र में अपने जहाज भेजेंगे।
मस्जिद में नमाज़ियों की तादाद पर हद लगाई तो कोर्ट बोला- एसडीएम व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो इस्तीफा दें
भास्कर के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल के पुलिस और जिला प्रशासन से नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा, ‘अगर एसपी और जिला कलेक्टर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं है तो उन्होंने इस्तीफा दे देना चाहिए या कहीं और ट्रांसफर करा लेना चाहिए।’ हाईकोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम ही जिला प्रशासन का है न कि पाबंदी लगाकर किसी समस्या से बचना। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी और आदेश उस याचिका पर दिया है जिसमें कहा गया था कि संभल का पुलिस और जिला प्रशासन एक मस्जिद में नमाजियों को नमाज पढ़ने से रोक रहा है और सिर्फ सीमित संख्या में ही नमाजियों को इजाजत दे रहा है। अदालत संभल निवासी मुनाजिर खान की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्हें रमजान के दौरान मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका गया। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि संभावित कानून व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए केवल 20 लोगों को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।
वांगचुक से हटाया एनएसए हटाया, रिहा
लद्दाख में हिंसा के बाद हिरासत में लिये गये सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक को शनिवार को 170 दिनों के बाद जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया. केंद्र सरकार ने उनकी हिरासत को तत्काल प्रभाव से समाप्त करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत की गयी कार्रवाई रद्द कर दी. सोनम वांगचुक पिछले कई महीनों से पुलिस निगरानी में थे. सरकार का कहना है कि यह फैसला लद्दाख में शांति और स्थिरता का माहौल मजबूत करने और सभी पक्षों के साथ रचनात्मक संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट के नौ जज तय करेंगे इंडस्ट्री की परिभाषा
प्रभात ख़बर के अनुसार देश में श्रम कानूनों की व्याख्या से जुड़े एक अहम सवाल पर अब सर्वोच्च न्यायिक मंच पर सुनवाई शुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ 17 मार्च से औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा से जुड़े विवादास्पद मुद्दे पर सुनवाई करेगी. यह पीठ सीजेआइ सूर्यकांत की अध्यक्षता में बैठेगी, इस पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे व न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल हैं. अदालत ने 18 मार्च तक सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा है. 1978 के फैसले पर होगी समीक्षा: बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि वीआर कृष्णा अय्यर द्वारा 1978 के मामले में ‘उद्योग’ शब्द की जो व्यापक परिभाषा दी गई थी।
कुछ और सुर्खियां:
- बिहार के 43वें राज्यपाल के रूप में सैयद अता हसनैन में शपथ ली
- पटना के खगोल में टीवी मैकेनिक कल्लू पासवान के घर से मिला 5 करोड़ का स्मैक
- इंडिगो ने पटना से दिल्ली के लिए किराया बढ़ाया, अब ₹5500-₹6500 लगेंगे
- पटना में नशा मुक्ति के लिए मैराथन आज, अटल पथ और गंगा पथ पर सुबह 9:00 बजे तक पाबंदी
- मोकामा के राजेंद्र सेतु स्टेशन पास ओवरहेड इलेक्ट्रिक वायर टूटने से मोकामा बरौनी रेल खंड पर डेढ़ घंटे तक ट्रेनें रुकी रहीं
अनछपी: ईरान पर अमेरिका और इसराइल के नाजायज हमले के 15 दिन बीतने के बाद यह बात साफ हो चुकी है कि दोनों हमलावरों ने जितनी आसानी से जीत की उम्मीद की थी, मामला बिल्कुल वैसा नहीं निकला। इन हमलों में अरब देशों खासकर सऊदी अरब, यूएई और बहरैन की हालत ईरान से भी बदतर नजर आती है। इसका यह मतलब नहीं है कि ईरान से ज्यादा नुकसान इन देशों का हुआ। इसका मतलब यह है कि इन देशों ने अपनी रक्षा व्यवस्था नहीं बनाई और पूरी तरह से अमेरिका या दूसरे देशों पर निर्भर रहे। इसका यह मतलब यह भी नहीं है कि उन्हें ईरान या अरब देशों से खतरा है बल्कि इसका मतलब यह है कि इन पर इसरायल का सबसे भयानक खतरा है और अगर अमेरिका मुंह मोड़ दे तो यह कहीं के ना रहें। यानी इन अरब देशों के लिए यह बात एक बर फिर उजागर हो गई है कि अमेरिका जानबूझकर उन्हें अपनी रक्षा प्रणाली विकसित करने नहीं दे रहा और उन्हें इस भ्रम में रखना चाहता है कि उनके लिए अमेरिका खड़ा है। इन अरब देशों को याद रखना चाहिए कि अगर इसराइल ईरान पर हमला कर सकता है तो अरब देश भी उसकी जद में ही हैं। कल किसी वजह से अमेरिका को इसराइल धता बता दे और अमेरिका की दिलचस्पी उससे लड़ने की ना हो तो यह अरब देश क्या करेंगे? वैसे सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता जरूर किया है लेकिन शायद उसे भी अपनी रक्षा के लिए अमेरिका और दूसरे देशों पर निर्भरता करने की सख्त जरूरत है। इससे पहले भी कई बार ऐसी स्थिति पैदा हुई है जब अरब देशों को अपनी आरामतलबी से निकलकर अपनी रक्षा व्यवस्था करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और आज उसका नतीजा भुगत रहे हैं।
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