छ्पी-अनछपी: यूजीसी पर अगड़ी जातियों में उबाल, यूरोपियन यूनियन से ‘मदर ऑफ आल डील्स’
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। यूजीसी के समानता नियम के खिलाफ अगड़ी जातियों में उबाल नज़र आ रहा है। भारत और यूरोपीय संघ में व्यपार समझौता हुआ है जिसे मदर ऑफ आल डील्स कहा जा रहा है। होली के पहले 15% तक महंगा हो जाएगा सरकारी बसों का किराया।
पहली ख़बर
उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव से निपटने के लिए यूजीसी द्वारा 13 जनवरी को नोटिफाई किए गए नियमों को लेकर मंगलवार को देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए। दिल्ली में भारी बैरिकेडिंग और बारिश के बीच, विभिन्न कॉलेजों के छात्रों ने यूजीसी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि नए नियम कैंपस में अराजकता पैदा कर सकते हैं। प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी को मांगपत्र सौंपा और ‘यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026’ को वापस लेने की मांग की। यूपी में लखनऊ समेत कई जिलों में प्रदर्शन हुए। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में भी इन नियमों को चुनौती दी गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि यूजीसी ने कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया है। याचिका में इस पर रोक लगाने की मांग की गई है। वहीं, केंद्र सरकार ने सफाई दी है कि किसी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा और नियमों का दुरुपयोग नहीं होगा। दिल्ली में एक प्रदर्शनकारी छात्र ने कहा, यूजीसी अधिकारियों ने ज्ञापन लिया है। वे इक्विटी स्क्वॉड में सामान्य वर्ग के सदस्य को शामिल करने और 12 फरवरी से पहले समाधान की कोशिश करेंगे। झूठी शिकायतों को हतोत्साहित करने के लिए शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय नहीं रखी जाएगी। इस नियम को लाने के पीछे यह वजह बताई जा रही है कि रोहित विमला और पायल तडवी की मौत से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में 2012 के नियमों के क्रियान्वयन पर सवाल उठे और यूजीसी से प्रभावी व्यवस्था लाने को कहा गया था।
विरोध की वजह क्या है?
भास्कर के अनुसार यूजीसी के नए नियम के आलोचकों और विरोध करने वालों का कहना है कि नए नियमों से सामान्य या अनारक्षित वर्ग के छात्रों के उत्पीड़न की आशंका बढ़ सकती है। झूठी शिकायत करने वालों के लिए दंड नहीं है। ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को ‘डिफाल्ट अपराधी’ की तरह पेश करते हैं। कुछ विवि और शिक्षण संस्थानों का तर्क है कि इक्विटी स्क्वॉड और इक्विटी कमेटी के जरिए यूजीसी कैंपस के आंतरिक प्रशासन में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप कर रहा है, स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
‘मदर ऑफ आल डील्स’
जागरण के अनुसार वैश्विक व्यवस्था में बढ़ती दरार, यूक्रेन से लेकर हिंद-प्रशांत तक फैले भू-राजनीतिक तनावों, चीन के साथ तनातनी और डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की तरफ से टैरिफ बुद्ध शुरू किए जाने के बीच भारत और यूरोपीय संघ ने अपने रिश्तों को अभूतपूर्व मजबूती देते हुए एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप दे दिया है, जिसे दोनों पक्षों ने दो अरब लोगों का बाजार बनाने के लिए ‘मदर ऑफ आल डील्स’ करार दिया है। मंगलवार को संपन्न भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व उर्सुला वान डेर लेबेन और एंटोनियो कोस्टा ने व्यापार और रक्षा को सहयोग के नए स्तंभ के रूप में स्थापित करते हुए न केवल एफटीए पर वार्ता के समापन की घोषणा की, बल्कि पहली बार रक्षा एवं सुरक्षा साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही भारतीय प्रतिभाओं की यूरोप में आवाजाही से जुड़े समझौते समेत कुल 13 कारो पर सहमति बनी और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था के साझा दृष्टिकोण के तहत वर्ष 2030 तक के लिए संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंट को मंजूरी दी गई। इस मदर ऑफ आल डील्स कहा जा रहा है क्योंकि वास्तविक व्यापार का एक तिहाई हिस्सा इसमें शामिल है। इसके तहत भारत से निर्यात होने वाली 9425 वस्तुओं पर टैरिफ नहीं लगेगा।
सरकारी बसों का किराया बढ़ेगा
बिहार राज्य पथ परिवहन निगम (बीएसआरटीसी) ने इसके लिए 15% तक वृद्धि का प्रस्ताव परिवहन विभाग को भेजा है. सिटी बसों में यह वृद्धि शहर के भीतर अलग-अलग रूटों और श्रेणियों (एसी-नॉनएसी/ सीएनजी-इलेक्ट्रिक) में एक से पांच रुपये तक होगी. शहर के बाहर के सिटी बस रूट में 12 रुपये की अधिकतम वृद्धि होगी. लॉन्ग रूट में 17 से 44 रुपये तक की वृद्धि संभावित है. निगम मुख्यालय इस प्रस्ताव पर विभाग की स्वीकृति मिलने का इंतजार कर रहा है. अगले माह यह स्वीकृति मिलने 4 संभावना है और होली से पहले नयी दरें लागू हो जायेंगी. गौरतलब है कि इससे पहले 2021 में किराये में बढ़ोतरी की गयी थी.
नीट छात्र रेप-मर्डर केस में 40 लोगों का डीएनए टेस्ट होगा
नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत के मामले में डीएनए जांच के लिए कुल 40 लोगों के खून के नमूने लिये जाएंगे। इनमें छात्रा के परिजन, हॉस्टल मालिक मनीष रंजन सहित 16 लोगों के नमूने लिये जा चुके हैं, जबकि 24 अन्य लोगों के नमूने लिये जाएंगे। मंगलवार को गर्दनीबाग अस्पताल में चार लोगों के खून के नमूने लिये गए। डीएनए जांच के लिए पुलिस ने संबंधित लोगों को पटना बुलाया था। इसके बाद उन्हें गर्दनीबाग अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों की टीम ने एक-एक कर सभी के खून के नमूने लिए। वहीं बेऊर जेल में बंद शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मकान मालिक मनीष कुमार रंजन का खून का नमूना भी डॉक्टरों की टीम ने लिया। गर्दनीबाग अस्पताल की प्रभारी डॉ. सीमा सिंह ने बताया कि सभी नमूनों को सुरक्षित रखा गया है। जल्द डीएनए जांच के लिए नमूनों को बाहर भेजा जाएगा। डॉक्टरों के अनुसार एसआईटी ने डीएनए परीक्षण के लिए 40 लोगों की सूची उपलब्ध कराई है। इनमें से अब तक 16 लोगों के खून के नमूने डीएनए जांच के लिए लिए जा चुके हैं।
कुछ और सुर्खियां:
- रविवार, 26 जनवरी और हड़ताल के कारण 3 दिन बंद रहे बैंक, बिहार में 50000 करोड़ का लेनदेन ठप
- दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के विजेता गायक अरिजीत सिंह ने प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास लिया
- फ्रांस में भी बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर लगाया जाएगा बैन
- पटना, भागलपुर और दरभंगा में कौओं की मौत की जांच में इन्फेक्शन का पता नहीं चला
- कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले नेता डॉक्टर शकील अहमद के फुलवारी शरीफ के एकता नगर स्थित घर पर बढ़ाई गई सुरक्षा
- डॉ नरेंद्र प्रताप सिंह बने पीएमसीएच के प्रिंसिपल
- ईरान और अमेरिका के तनाव को देखते हुए इंडिगो ने चार देशों की उड़ानें रद्द की
अनछपी: भारत ने अभी-अभी अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाया है लेकिन लोकतंत्र के मूल सिद्धांत ‘समानता’ के बारे में यूजीसी के नए नियम को लेकर अगड़ी जातियों में उबाल देखा जा रहा है। यूजीसी ने समानता के नए नियम के लिए जाति के आधार पर प्रताड़ना के बारे में सख्ती अपनाई है जिसे अगड़ी जाति के लोग अपने खिलाफ मान रहे हैं। इस मामले में एक अहम पहलू बहस से गायब है और वह यह है कि अल्पसंख्यकों खास कर मुसलमानों के साथ कैंपस में जो नाइंसाफी होती है, उस पर कोई नियम क्यों नहीं बना? एक तरफ जहां सताए जाने के खिलाफ कानून बनाया जाना जरूरी है तो दूसरी तरफ उस कानून का गलत इस्तेमाल भी समाज के लिए एक बड़ी समस्या है। इसका एक उदाहरण हमें दहेज के खिलाफ बनाए गए कानून के गलत इस्तेमाल से भी मिलता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि दहेज प्रताड़ना नहीं होती है और उसके खिलाफ कानून नहीं होना चाहिए। इसलिए यह सवाल पूछना जरूरी है कि जब यूजीसी ने जातीय आधार पर प्रताड़ना के लिए कानून बनाया है तो धार्मिक आधार की प्रताड़ना को इससे बाहर क्यों रखा है? सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को इस बात के लिए चिंता होनी चाहिए कि कैंपस में धर्म के आधार पर जो प्रताड़ना होती है उसे कैसे रोका जाए और यूजीसी इसके लिए नियम बनाए। हमने विश्वविद्यालय के कैंपसों में धर्म के आधार पर छात्रों को सताए जाने के कई मामले देखे हैं। चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है इसलिए अल्पसंख्यक छात्रों के बारे में भी वहां चर्चा होनी चाहिए और संबंधित संगठनों को इसके बारे में अर्जी देनी चाहिए।
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