छपी-अनछपी: नीतीश मंत्रिमंडल में परिवारवाद की भरमार, नेपाल में फिर भड़के जेन ज़ी
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उनके मंत्रिमंडल में दर्जन भर लोग परिवार वाद वाले हैं। नेपाल में एक बार फिर जेन ज़ी भड़क उठे हैं और वहां कर्फ्यू लागू करना पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधेयकों पर राज्यपाल और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए समय सीमा तय नहीं की जा सकती। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।
पहली ख़बर
भास्कर के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में गुरुवार को पटना के गांधी मैदान में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और 26 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें भाजपा के सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा समेत 14, जदयू के 8, लोजपा (आर) के 2, तथा हम (से) और रालोमो के 1-1 मंत्री हैं। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने गांधी मैदान में सबको शपथ दिलाई। इसी के साथ नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नया रिकॉर्ड बनाया। समारोह में प्रधानमंत्री मोदी भी उपस्थित थे। वे करीब 35 मिनट तक मंच पर रहे। प्रधानमंत्री ने जब केसरिया गमछा लहराया तो पूरा मैदान गमछा लहराने लगा। मंत्रिमंडल से पुराने 21 चेहरे बाहर किए गए हैं। 12 नए चेहरे शामिल किए गए हैं। इनमें भाजपा के 9, लोजपा (आर) के 2 और रालोमो के 1 मंत्री हैं। जदयू के सभी चेहरे पुराने ही हैं। नई कैबिनेट की पहली बैठक शुक्रवार को होगी। इसमें 18वीं विधानसभा के पहले सत्र की तिथि तय की जा सकती है। इसके पहले मुख्यमंत्री विभागों का बंटवारा करेंगे। विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के 6 दिन बाद नीतीश ने मंत्रिमंडल बनाया। 27 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 3 महिलाएं शामिल हैं। भाजपा की श्रेयसी सिंह और रमा निषाद, तथा जदयू की लेसी सिंह। नए चेहरों में भाजपा के दिलीप जायसवाल, रामकृपाल यादव, संजय सिंह टाइगर, अरुण शंकर प्रसाद, नारायण प्रसाद, रमा निषाद, लखेन्द्र कुमार रोशन, श्रेयसी सिंह और डॉ. प्रमोद कुमार हैं। लोजपा (आर) से संजय कुमार और संजय कुमार सिंह तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा से दीपक प्रकाश हैं। मंत्री बने 26 लोगों में 11 ऐसे हैं, जिनके पिता या घर वाले राजनीतिज्ञ रहे। मंत्री-विधायक भी रहे। हालांकि इनमें कई ने मौका मिलने के बाद अपने बूते खुद को राजनीति में और मजबूती से स्थापित किया।
एनडीए का परिवारवाद
- सम्राट चौधरी – पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के पुत्र
- संतोष कुमार सुमन-केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के पुत्र
- सुनील कुमार – पूर्व मंत्री चंद्रिका राम के पुत्र
- विजय कुमार चौधरी – पूर्वविधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र
- दीपक प्रकाश – रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र
- श्रेयसी सिंह – पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की पुत्री
- रमा निषाद-पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद की पुत्रवधु व पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी
- डॉ. अशोक चौधरी पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र
- नितिन नवीन – पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र
- संजय सिंह टाइगर – पूर्व विधायक धर्मपाल सिंह के भाई
- लेसी सिंह – समता पार्टी के वरीय नेता बूटन सिंह की पत्नी
- रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को सीधे मंत्री बनवाया। दीपक ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। गुरुवार को उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली। आगे उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया जाएगा।
नेपाल में फिर भड़के जेन ज़ी
हिन्दुस्तान के अनुसार नेपाल में गुरुवार को एक बार फिर जेन जी आंदोलनकारियों का गुस्सा भड़क गया। प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हुई। इस दौरान पथराव भी किया गया गया। झड़पों में छह पुलिसकर्मियों समेत दस लोग घायल हुए हैं। दरअल, बुधवार को भारत सीमा से लगे बारा जिले में जेन जी प्रदर्शनकारियों और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली की पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई थी, जिसके बाद प्रशासन ने इलाके में कर्फ्यू लगा दिया। जेन जी प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस मामले में शिकायत के बाद भी पुलिस ने ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के नेताओं को गिरफ्तार नहीं किया।
विधेयकों पर मंजूरी के लिए समय सीमा तय नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
प्रभात खबर अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती. शीर्ष अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी विधेयकों को मंजूरी नहीं दे सकता. अपने सर्वसम्मत फैसले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह भी कहा कि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत प्रदत्त अधिकारों से परे जाकर विधेयकों को लंबित नहीं रख सकते. प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई की अगुवाई वाली पीठ ने कहा, हमें नहीं लगता कि राज्यपालों के पास राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर रोक लगाने की असीमित शक्ति है. पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर शामिल थे. पीठ ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय करना संविधान द्वारा प्रदत्त लचीलेपन के विरुद्ध है. गौरतलब है कि तमिलनाडु सरकार की याचिका पर पीठ ने अप्रैल में तय किया था कि राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर तीन महीने में मंजूरी देनी होगी.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी
हिन्दुस्तान के अनुसार बिहार चुनाव में करारी हार के बाद विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ आर-पार के मूड में है। संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष इस मुद्दे को पूरे जोर-शोर से उठाने की तैयारी कर रहा है। साथ ही इंडिया गठबंधन के घटक दल मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को पद से हटाने के लिए उनके खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव की संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं। रणनीतिकार मानते हैं कि एसआईआर के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन को एकजुट और पूरी आक्रामकता के साथ लड़ाई लड़नी होगी। कांग्रेस सहित कई घटक दल मुख्य चुनाव आयुक्त पर सत्तारूढ़ भाजपा के साथ साठगांठ का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में गठबंधन के घटक दलों को इन आरोपों से आगे बढ़कर कुछ करते हुए दिखाना होगा।
कुछ और सुर्खियां:
- एमपी एमएलए कोर्ट ने मोकामा के नव निर्वाचित विधायक अनंत सिंह को दुलारचंद हत्याकांड में जमानत नहीं
- जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर पश्चिम चंपारण के भीतिहरवा गांधी आश्रम में मौन व्रत पर रहे
- ईडी ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस की 1452 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की
- ईडी ने ब्रिटेन के हथियार कारोबारी संजय भंडारी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया
अनछपी: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में कहा कि वह विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय नहीं कर सकता। याद रखने की बात यह है कि इसी सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले इस काम के लिए एक समय सीमा तय की थी। कहने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल को अनिश्चितकाल तक किसी विधेयक को रोके रखने का अधिकार भी नहीं है लेकिन यह कहने का क्या फायदा जब कोई समय सीमा तय ही नहीं हो। सुप्रीम कोर्ट ने अपना यह फैसला तब बदला है जब राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट में कुछ सवाल भेज कर एक तरह से सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपना पहला फैसला जब किया था तब भी उसने संविधान के प्रावधानों का ध्यान रखा होगा और अब नए फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट इस संविधान का हवाला दे रहा है। ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि समय सीमा खत्म होने पर राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को खुद ब खुद मंजूर घोषित करना वास्तव में न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के कामों पर कब्जा करना है। अदालत ने बहुत हल्के अंदाज में यह जरूर कहा कि राज्यपाल लंबे समय तक या बिना वजह मंजूरी देने में देरी करते हैं तो कुछ निराशा निर्देश जारी किया जा सकता है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश बेहद निराशाजनक है और बिना चुने हुए प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल को चुने हुए सरकार पर थोपने जैसा है। साफ तौर पर यह सरकार चल रही केंद्र की पार्टी के पक्ष में झुका हुआ फैसला है और इसे बदलने की जरूरत है।
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