छपी-अनछपीः पीएफआई पर बैन की तैयारी, विधवा ने शादी की तो पंचों ने कहा- गांव छोड़ो

बिहार लोक संवाद डाॅट नेट, पटना। हिन्दी और अंग्रेजी अखबार का फर्क देखने के लिए आज का दिन सही रहेगा। हिन्दी के सभी अखबारों में कथित गजवा ए हिन्द से जुड़ी खबरें लीड हैं तो टाइम्स आॅफ इंडिया की पहली खबर मोहम्मद जुबैर के जेल से छूटने की खबर है। हिन्दुस्तान में यह खबर आखिरी से एक पेज पहले के आखिरी हिस्से में है।
हिन्दुस्तान की लीड हैः गजवा-ए-हिन्द पर 4 राज्यों की एटीएस कसेगी शिकंजा। इसमें बताया गया है कि बिहार के अलावा यूपी, महारष्ट्र और तेलंगाना का आतंकवादी विरोधी दस्ता-एटीएस इसके नेटवर्क की जांच करेगा। जागरण ने इसे पीएफआई के कथित देश विरोधी मामले की जांच से जोड़ा है।
प्रभात खबर की हेडलाइन हैः आतंकी कनेक्शन मिलने पर पीएर्फआ पर बैन की तैयारी। अखबार के अनुसार इसके लिए पुलिस मुख्यालय में विचार-विमर्श चल रहा है। इस मामले की जांच में एनआईए और आईबी भी लगी है। साथ ही राॅ विदेशी कनेक्शन की जांच कर रही है।
भास्कर ने लिखा है कि एसएसपी, पटना ने मांग की हैैः गजवा-ए-हिन्द नेटवर्क की जांच आतंकवाद निरोधी दस्ता ही करे। इस अखबार ने एसएसपी का यह बयान भी छापा हैः एसडीपीआई-पीएफआई बैन नहीं, इसिलए नहीं लगा यूएपी एक्ट।
टाइम्स आॅफ इंडिया ने जुबैर को सुप्रीम कोर्ट से यूपी के सभी एफआईआर मामले में अंतरिम जमानत मिलने की खबर में बताया है कि कोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा गठित एसआईटी को भी भंग कर दिया है। अब सभी मामलों का केस दिल्ली में चलेगा।
भास्कर अखबार ने मुजफ्फरपुर के देवरिया कोठी से खबर दी है कि वहां एक पंचायत ने एक विधवा द्वारा शादी करने पर उसे गांव छोड़ने का आदेश दिया है। इस महिला ने इसके बारे में पुलिस से शिकायत की है।
मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट- नीट यूजी- में फर्जीवाड़े में नालंदा और नवादा के 6 साॅल्वर के पकड़े जाने की खबर भी प्रमुखता से छपी है। यह एक गंभीर मामला है जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। पिछले साल यही फर्जीवाड़ा आईआईटी-एनआईटी में प्रवेश के लिए होने वाले जेईई में सामने आया था।
रांची में पशु तस्करों द्वारा महिलए सब इंस्पेक्टर को कुचल कर मारने की खबर भी प्रमुखता से छपी है।
दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डा. शशिनाथ झा के गिरफ्तार होने की खबर हिन्दुस्तान ने दी है। इसकी वजह किसी कर्मचारी के पंेशन संबंधी मामले में अदालत में पेश न होना बतायी जा रही है।
अनछपीः भाजपा और भाजपा सरकार अक्सर मुस्लिम समाज में पायी जानी वाली कुुरीतियों की बात करती है। इसीलिए ट्रिपल तलाक कानून भी लेकर आयी। मगर भारत के सबसे बड़े सामाजिक समूह में पायी जानी वाली कुरीतियों पर हमारा ध्यान कम है। आखिर क्या वजह है कि कानूनी रूप से मान्य विधवा विवाह पर ऐसे फरमान जारी होते हैं? कहीं इसका आधार वही पुरानी धार्मिक-सामाजिक सोच तो नहीं है? सरकार की यह महती जिम्मेदारी है कि वह विधवा विवाह या तलाक के बारे में सामाजिक जागरूकता का कार्यक्रम चलाये। हो सके तो इसके लिए सख्त कानून लेकर आये। आखिर कौन किससे शादी करेगा यह देश के कानून से तय होगा या उन कथित पंचों के फरमान से जिन्होंने देवरिया कोठी की आंगनबाड़ी सेविका को इस वजह से 25 जुलाई तक गांव छोड़ने को कहा है कि उसने विधवा होने के बाद शादी क्यों की। उसने मंदिर में जाकर शादी की और वह भी इस समाज को मंजूर नहीं। आखिर हम कैसे समाज में रह रहे हैं?

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