छ्पी-अनछपी: चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के सवालों के घेरे में, इंजीनियर-डीएसपी की अकूत अवैध दौलत
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। बिहार में वोटर वेरीफिकेशन के चुनाव आयोग के फरमान पर सुप्रीम कोर्ट ने कई सवाल खड़े किए हैं हालांकि उसने इस प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई है। आर्थिक अपराध इकाई ने एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और एक डीएसपी की अकूत अवैध संपत्ति पर कार्रवाई की है। गवर्नमेंट तिब्बी कॉलेज हॉस्पिटल पटना में दवा खरीद के मामले में बड़े घोटाले का पता चला है।
पहली खबर
जागरण के अनुसार बिहार में चल रहा मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने का संवैधानिक अधिकार है हालांकि शीर्ष कोर्ट ने चल रही प्रक्रिया के समय को लेकर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव से ऐन पहले यह हो रहा है इसलिए यह आशंका हो सकती है कि अगर किसी का नाम कटता है तो उसे सुनवाई लिए समय मिलेगा या नहीं। कोर्ट ने मतदाता सूची में शामिल होने के लिए निर्धारित 11 दस्तावेजों की सूची को लेकर भी चुनाव आयोग से प्रश्न किये और अंतरिम आदेश में इसमें आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को भी शामिल करने पर विचार करने को कहा। 28 जुलाई को कोर्ट फिर सुनवाई करेगा।
कोर्ट के सामने तीन सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि हमारी राय है कि तीन प्रश्न शामिल हैं। 1. इस प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग की शक्तियां 2. प्रक्रिया और तरीका जिसमें यह कवायद की जा रही है और 3. समय, इसमें मसौदा मतदाता सूची तैयार करने के लिए दिया गया समय भी शामिल है। कोर्ट ने यह कहते हुए सुनवाई स्थगित कर दी की 10 विपक्षी दलों समेत किसी भी याचिकाकर्ता ने एसआईआर पर अंतरिम रोक की मांग नहीं की है।
नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का नहीं गृह मंत्रालय का काम है
याचिकाकर्ताओं के वकील शंकर नारायण, अभिषेक सिंघवी और कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग द्वारा तय 11 दस्तावेजों की सूची में आधार मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को शामिल नहीं करने पर भी सवाल उठाए। इसके बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी से इस पर सवाल किया। द्विवेदी ने कहा कि आधार नागरिकता का सबूत नहीं है। लेकिन पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता नहीं तय करता, यह काम गृह मंत्रालय का है। पीठ ने कहा कि अगर आपको मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण के तहत नागरिकता जांचनी थी तो यह प्रक्रिया पहले शुरू करनी चाहिए थी। नवंबर में चुनाव होने हैं, अब समय कम है।
एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के पास अकूत अवैध संपत्ति
हिन्दुस्तान के अनुसार बिहार सरकार की तीन एजेंसियों एसवीयू, ईओयू और निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने गुरुवार को पांच भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई की। बीएसईआइडीसी के निलंबित कार्यपालक अभियंता और मद्य निषेध डीएसपी के यहां आय से अधिक संपत्ति मामले में छापे मारे गए। एसवीयू और निगरानी की कार्रवाई में प्रधान लिपिक, अमीन और राजस्व कर्मचारी को घूस लेते दबोचा गया। आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) ने बिहार राज्य शैक्षणिक आधारभूत संरचना विकास निगम के कार्यपालक अभियंता प्रमोद कुमार के सहरसा, सीतामढ़ी व पटना स्थित छह ठिकानों पर छापेमारी की। आय से 310 फीसदी अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करते हुए छानबीन शुरू की गई थी। जांच में अभियंता के ठिकानों से 5.29 लाख नकद व 3.55 करोड़ से अधिक के जमीन के कागजात मिले हैं। बैंक खातों में 18.85 लाख रुपये जमा और 11 लाख के वाहन की जानकारी मिली है।
डीएसपी के पास भी बेहिसाब दौलत
एसवीयू ने बिहार पुलिस के अपराध अनुसंधान विभाग के मद्य निषेध प्रभाग में तैनात डीएसपी अभय कुमार यादव के पटना और खगड़िया स्थित आवास और कार्यालय परिसर में छापेमारी की। उन पर एसवीयू थाने में 50.42 फीसदी आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया था। इनके परिसरों से 1.05 लाख रुपये नकद और 12 लाख से अधिक के सोने-चांदी के आभूषण मिले। जमीन खरीद-बिक्री के कुल 09 सेल डीड मिले हैं, जिनकी कीमत करोड़ों में हैं। इन्होंने खगड़िया में पांच कट्ठा से अधिक जमीन पर 15 कमरे का तीन मंजिला मकान बनाया है। 25 से अधिक किसान विकास पत्र में लाखों रुपये का निवेश मिला है। 20 से अधिक बैंक खातों की जानकारी मिली है। एफडी के कागजात भी मिले हैं।
तिब्बी कॉलेज में दवा खरीद में घोटाला
पटना स्थित गवर्नमेंट तिब्बी कॉलेज और अस्पताल में यूनानी दावों की खरीद में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। प्रभात खबर ने लिखा है की साजिश इतनी बारीकी से रची गई कि जो दवा अगस्त 2022 में बनी उसे अस्पताल के स्टॉक रजिस्टर में दो महीने पहले 30 जून 2022 को ही दर्ज किया गया। बिना टेंडर और कोटेशन के मुरादाबाद की एक निजी कंपनी से 14 लाख 79000 की दवा खरीदी गई और ग्लोबल मार्केटिंग एंड प्लेसमेंट नमक एजेंसी को 14.20 लाख की सप्लाई के बदले 28.5 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया। जांच में सामने आया कि यूनानी दवा की भारी मात्रा एक्सपायर हो चुकी है और रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई है। इस मामले में अस्पताल के निम्न वर्गीय लिपिक धीरज कुमार को मुख्य आरोपी मानते हुए वीआरएस दे दी गई है। स्वास्थ्य विभाग के आयुष निदेशालय ने अस्पताल अधीक्षक की चिट्ठी के आधार पर जांच समिति गठित की थी।
कुछ और सुर्खियां:
- पटना के दुल्हिन बाजार में बालू कारोबारी रमाकांत यादव की गोली मारकर हत्या
- पटना एयरपोर्ट के पुराने टर्मिनल भवन में स्टील काटने के काम के दौरान आग लगी
- राजगीर क्रिकेट स्टेडियम की क्षमता 40000 दर्शकों की होगी
- दिल्ली एनसीआर में भारी बारिश, सड़कें धंसीं, हरियाणा में 6 की मौत
अनछपी: चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सुप्रीम कोर्ट के टिप्पणियों और सलाहों के बाद एक बार फिर मीडिया के रवैया पर चर्चा करने की जरूरत है और यह देखना भी जरूरी है कि क्या इसका रवैया जनता की आवाज बनने वाला है या यह अभी सरकार और चुनाव आयोग का ही भोंपू बना रहना चाहता है। हमने देखा कि एक अखबार ने पूरी तरह से चुनाव आयोग को पसंद आने वाली हेडलाइन लगाई है, एक दूसरे अखबार ने ऐसी हेडलाइन लगाई है जो आम जनता की आवाज लगती है हालांकि आमतौर पर उसका रवैया सही नहीं रहता है। दो दूसरे अखबारों ने बीच-बीच का रास्ता अपनाते हुए पहले चुनाव आयोग की और फिर जनता की बात को भी हेडलाइन में जगह दी है। याद रखने की बात यह है कि अखबार या मीडिया के दूसरे अंगों की जिम्मेदारी जनता की आवाज बना है, सरकार और चुनाव आयोग का भोंपू बनना नहीं। सरकार या चुनाव आयोग की ओर से दी गई जानकारी या उसके किसी अच्छे कदम के बारे में चर्चा करना किसी भी तरह गलत नहीं है लेकिन जनता की आवाज को दबाकर उनकी आवाज को ऊपर रखना हमेशा सवालों के घेरे में रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐसी कोई राहत नहीं दी जिससे कि आम लोगों को चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार अपना फार्म और दस्तावेज जमा करने से मुक्ति मिले लेकिन अच्छी बात यह है कि उसने आम लोगों के सवालों को आवाज दी। वोटर वेरीफिकेशन या रिवीजन करना बहुत अच्छी बात है लेकिन इसके नाम पर लोगों को परेशान करना और लगभग 8 करोड़ मतदाताओं को फॉर्म जमा करने और इनमें से लगभग तीन करोड़ लोगों को दस्तावेज के लिए मारे मारे फिरने के लिए मजबूर करना कहीं से सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह जरूर कहा है कि वह वोटर वेरीफिकेशन जारी रख सकता है लेकिन उसे इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि इस वोटर वेरीफिकेशन को नवंबर में होने वाले विधानसभा के चुनाव से लागू नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग के उस दावे पर भी सवाल करना चाहिए जिसमें वह कहता है कि सब कुछ सफलतापूर्वक चल रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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