छ्पी-अनछपी: ट्रंप का दावा- ख़ामेनई मारे गए, पहले इनकार के बाद ईरान ने भी माना
बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हो चुकी है। हालांकि पहले तो ईरान ने इनकार किया लेकिन कुछ घंटों बाद ईरान के सरकारी टेलीविजन पर यह ऐलान किया गया कि उनकी मौत हो चुकी है। हालांकि यह खबर अखबारों में नहीं हैं लेकिन आज इससे बड़ी कोई खबर नहीं। ईरान ने कहा है कि इसराइल और के हमले में 85 से ज्यादा छात्राओं की मौत हो गई।
पहली ख़बर
बीबीसी के अनुसार शनिवार को अमेरिका और इसराइल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे और रविवार तड़के अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्रुथ सोशल पर ख़ामेनेई की मौत को लेकर दावा किया है. ईरान के सरकारी टीवी के प्रेज़ेंटर ने रोते हुए ख़ामेनेई की मौत की घोषणा की और बताया देश में 40 दिनों का शोक रहेगा.
पहले ईरान की समाचार एजेंसी फ़ार्स का कहना था कि जानकार सूत्रों ने बताया है कि अली ख़ामेनेई की मौत की ख़बर झूठी थी और यह अमेरिकी मनोवैज्ञानिक युद्ध का नतीजा है. रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के करीबी माने जाने वाली फ़ार्स न्यूज एजेंसी ने तुरंत इस ख़बर का खंडन करते हुए लिखा था, “ट्रंप झूठी और फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने का लंबा इतिहास रहा है. इस तरह के व्यवहार के पिछले उदाहरणों में से एक मशहद शहर के पतन के बारे में उनका दावा है, जो कुछ समय बाद निराधार साबित हुआ और केवल मीडिया का सनसनीख़ेज़ प्रचार था.”केवल मीडिया का सनसनीख़ेज़ प्रचार था.” यह खंडन बाद में गलत साबित हुआ।
ख़ामेनेई की बेटी, दामाद और नाती मारे गए
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर से जुड़ी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की बेटी, दामाद और नाती इन हमलों में मारे गए हैं. फ़ार्स ने यह भी बताया है, “कहा जा रहा है कि इन हमलों में ख़ामेनेई की एक बहू की भी मौत हो गई है.”

ट्रंप ने और क्या कहा?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर लिखा, “ख़ामेनेई, जो इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक थे, अब मर चुके हैं. यह सिर्फ़ ईरान के लोगों के लिए ही न्याय नहीं है, बल्कि उन महान अमेरिकियों और दुनिया के कई देशों के उन लोगों के लिए भी न्याय है, जिन्हें ख़ामेनेई और उनके खूनी गिरोह ने मार डाला या घायल कर दिया.” वह हमारी खुफ़िया और अत्याधुनिक ट्रैकिंग प्रणालियों से बच नहीं सके, और इसराइल के साथ मिलकर किए गए अभियान में, न तो वे और न ही उनके साथ मारे गए दूसरे नेता कुछ कर सके.”
ताबड़तोड़ हमलों के बाद ईरान का पलटवार
घेराबंदी, पाबंदी और धमकियों के दौर के बाद आखिरकार अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला बोल दिया। शनिवार सुबह दोनों देशों की सेनाओं ने कई ओर से ईरान पर बमबारी शुरू कर दी। ईरान ने भी पलटवार किया और इजरायल सहित अमेरिका के कई सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों की बौछार कर दी। इससे मध्यपूर्व एशिया दहल गया। ईरान ने इजरायल के अलावा कुवैत, कतर, बहरीन, दुबई और सऊदी अरब में अमेरिकी बेस को निशाना बनाया। इजरायल के तेल अवीव और हाइफा में धमाकों की आवाज सुनी गई। जॉर्डन में भी सायरन बजने लगे। बहरीन ने कहा कि अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय को निशाना बनाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इन हमलों में कुछ अमेरिकी नागरिक मारे गए हैं। इसराइली सेना ने दावा किया उन्होंने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर जनरल मोहम्मद पाकपुर, रक्षा मंत्री अमीर नासिरजादेह और खुफिया चीफ को मार गिराया। ईरान ने इसकी पुष्टि तो नहीं की मगर स्वीकार किया, उनके कुछ अधिकारी मारे गए। एक बालिका विद्यालय पर हुए हमलों में 85 लोगों की मौत हो गई, वहीं एक स्पोर्ट्स हॉल पर हुए हमले में 15 लोग मारे गए। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है। इस मार्ग से तेल-गैस का करीब 30 फीसदी व्यापार होता है। वहीं दुबई के पाम जुबैरा इलाके में ड्रोन हमले से एक होटल में भीषण आग लग गई। बुर्ज खलीफा को भी खाली कराए जाने की खबर है।
दुबई, अबु धाबी सहित 10 से ज्यादा एयरपोर्ट बंद
भास्कर के अनुसार अमेरिका-इसराइल और ईरान युद्ध के कारण दुनिया के बड़े हिस्से में कनेक्टिविटी प्रभावित हुई। खाड़ी देशों में हवाई क्षेत्र बंद होने से सैकड़ों उड़ानें रद्द हुईं। दुबई, अबु धाबी सहित 10 से ज्यादा एयरपोर्ट बंद हो गए। दुबई एयरपोर्ट पर रोज 1300 विमान उतरते-उड़ते हैं। भारतीयों सहित हजारों लोग फंसे हैं। भारत के दो विमान रास्ते से लौटे। एअर इंडिया-इंडिगो ने खाड़ी देशों की और वहां से गुजरने वाली उड़ानें रोक दीं। रविवार को भी लंदन, शिकागो, न्यूयॉर्क, टोरंटो सहित 26 उड़ानें रद्द रहेंगी। केंद्र ने एयरलाइंस को डायवर्जन पर काम करने को कहा है।
भारत की अपील- तनाव कम करें
जागरण के अनुसार भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को ईरान और इजरायल के विदेश मंत्रियों से अलग-अलग फोन पर वातचीत कर तत्काल तनाव घटाने, संयम बरतने और संवाद के रास्ते पर लौटने की अपील की। जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराक़ची से वातचीत कर भारत की गहरी चिंता व्यक्त की और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया। विदेश मंत्री ने इंटरनेट मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि भारत ने हालिया घटनाक्रम को लेकर अपनी गंभीर चिंता साझा की है और तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत दोहराई है।
ईरान पर हमले को लेकर दुनिया दो खेमों में बंटी
जागरण लिखता है कि अमेरिका और इसराइल द्वारा शनिवार को ईरान पर किए गए हमलों को लेकर दुनिया दो खेमों में बंट गई है। कई देश जहां इसके लिए ईरान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो कई देश अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को जिम्मेदार मानते हुए परमाणु तबाही की आशंका जता रहे हैं। रूस और चीन ने ईरान पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि इन्हें तुरंत रोककर कूटनीति के रास्ते पर लौटना चाहिए। वहीं आस्ट्रेलिया व कनाडा ने ईरान पर हमलों का खुलकर समर्थन किया है। यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ताओं को फिर से शुरू करने की मांग की। साथ ही पश्चिमी एशिया क्षेत्र में कई देशों पर ईरानी हमलों की निंदा की। हालांकि उन्होंने अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमलों पर सीधे टिप्पणी नहीं की। रूस ने ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इसे बिना उकसावे के यानी अकारण हमला करार दिया। रूस का कहना है कि यह एक संप्रभु राज्य के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और तत्काल कूटनीति के रास्ते पर लौटना चाहिए। रूसी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी और इसराइली बलों द्वारा ईरानी क्षेत्र पर किए गए हमलों को ‘पूर्व-नियोजित’ आक्रमण बताया। साथ ही कहा कि ऐसे कदम वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसराइल-अमेरिका के हमले की कुछ और बातें
- इसराइल ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन रोडिंग लाइन और अमेरिका ने एपिक फ्यूरी नाम से शुरू किया अभियान
- ईरान के मिनाब शहर में एक प्राइमरी स्कूल पर इसराइली हमले में 85 से ज्यादा छात्राओं की मौत
- 24 ईरानी प्रान्तों में दोनों देशों ने किया हमले, 200 से ज्यादा लोगों की मौत
- ईरान ने बहरीन स्थित अमेरिकी नौसेना के पांचवें बड़े के मुख्यालय पर मिसाइल दागी
पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन चुनाव में एनएसयूआई ने बाज़ी मारी
हिन्दुस्तान के अनुसार पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के इतिहास में एनएसयूआई ने पहली बार अध्यक्ष और महासचिव के पद पर कब्जा जमाया। शनिवार देर रात जारी चुनाव परिणाम में इन दोनों बड़े पदों पर एनएसयूआई के प्रत्याशियों को विजयी घोषित किया गया। एनएसयूआई के शांतनु शेखर ने अध्यक्ष पद पर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी छात्र जदयू के प्रिंस कुमार को 1496 वोटों से हराया। शांतनु को 2896, जबकि प्रिंस कुमार 1400 वोट मिले। महासचिव पद पर एनएसयूआई की खुशी कुमारी को जीत हासिल हुई। खुशी को 2164 वोट हासिल हुए। दूसरे स्थान पर छात्र राजद के प्रत्यूष राज को 1611 वोटों से संतोष करना पड़ा। खुशी ने 553 मतों से जीत दर्ज की। पिछली बार अध्यक्ष पद पर एबीवीपी की मैथिली ने एनएसयूआई के मनोरंजन को 603 वोटों से हराया था।
कुछ और सुर्खियां:
- आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले में पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट से 20 लोगों की मौत
- जम्मू कश्मीर में 67 साल में पहली बार रणजी ट्रॉफी जीती, आठ बार के चैंपियन कर्नाटक दूसरे स्थान पर
अनछपी: ताज़ा हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता के मारे जाने की खबर के मामले में इतना तो आसानी से कहा जा सकता है कि या तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप झूठ बोल रहे हैं या ईरान इस बात को छुपा रहा है। (इन पंक्तियों के लिखने के बाद ईरान ने भी मौत की पुष्टि कर दी है।) दरअसल जंग में झूठ बोलना हमेशा से एक रणनीति रही है और अमेरिका ने इसका भरपूर इस्तेमाल किया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद तेहरान से भगाए गए अमेरिका को ऐसा लग रहा होगा कि वह दोबारा ईरान पर कब्जा कर सकता है और अपनी पसंद का बिट्टू शासक बना सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इतने वर्षों में ईरान की इस्लामी क्रांति में जी रहे लोग अमेरिका के शासन को स्वीकार करते हैं या प्रतिरोध में और मजबूती इसके साथ खड़े होते हैं। दुनिया का इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है और हमलावरों के खिलाफ असली लड़ाई जनता ने लड़ी है। कहा जा रहा है कि ईरान पर इस हमले का पूरी दुनिया पर असर पड़ सकता है लेकिन यह भी सच्चाई है की पूरी दुनिया इस बर्बादी को रोकने में नाकाम रही है। यह हो सकता है कि हमलावरों के खिलाफ जद्दोजहद में बरसों लगे और लाखों लोग मारे जाएं लेकिन आखिरकार हमलावर को भागना पड़ता है जैसा कि हमने हाल में अफगानिस्तान में देखा है। इसमें कोई शक नहीं कि अफगानिस्तान में तबाही की सबसे बड़ी वजह रूस और अमेरिका रहे हैं लेकिन सच्चाई यह भी है कि लाखों अफगानियों के मारे जाने के बावजूद दोनों को वहां से भागना पड़ा। यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी। जो मजबूत होगा वह कमजोर पर शासन करना चाहेगा और कमजोर उसके खिलाफ अपनी जद्दोजहद करता रहेगा।
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