छ्पी-अनछपी: ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करने की मांग, बिहार दारोगा भर्ती मुख्य परीक्षा रद्द

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दोनों चुनाव आयुक्तों को दरकिनार कर पूरी तरह एकतरफा फैसला लेने की खबरों के बाद पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें गिरफ्तार करने और राज्य में दोबारा पुरानी मतदाता सूची से चुनाव कराने की मांग की है। पेपर लीक के दावों के बाद आखिरकार बिहार दारोगा भर्ती की मुख्य परीक्षा रद्द कर दी गई है।

पहली खबर

हिन्दुस्तान के अनुसार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के मीडिया दावे के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्षी दलों ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उनका इस्तीफा मांगा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान लेने और एसआईआर तुरंत रोकने की मांग की है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भाजपा, आरएसएस, निर्वाचन आयोग पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्होंने इसे किया है, उन्होंने देशद्रोह का कृत्य किया है। राहुल गांधी ने कहा कि वोट चोरी भारतीयों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला है न्याय किया जाएगा। वोट चोरी में शामिल निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि सवाल केवल मतदान में धांधली का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं पर सरकार द्वारा कब्जा करने का है। देश को प्रधानमंत्री से जवाब मांगना होगा। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने कहा कि यह साबित हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग ने बंगाल चुनाव में गड़बड़ी की पूर्ण ग्राम उन्होंने ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार कर बंगाल में पुरानी मतदाता सूची से दोबारा चुनाव करने की मांग की। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया की मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले चुनाव आयोग चल रहे हैं। उन्होंने एस ए आर को तत्काल रद्द करने की मांग की। शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र, बंगाल व तमिलनाडु चुनाव रद्द किया जाए और मत पत्रों से दोबारा मतदान कराया जाए। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी बिहार और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में फर्जीवाड़ा का आरोप लगाते हुए दोबारा चुनाव कराने की मांग की। इधर भाजपा ने विपक्ष के इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है तो चुनाव आयोग ने सफाई दी है कि सभी फैसले सहमति से लिए गए और वहां कोई टकराव नहीं है।

10 महीने में 14 से ज्यादा बार दोनों चुनाव आयुक्तों ने दर्ज कराईं आपत्तियां

जागरण के अनुसार अब तक विपक्ष के निशाने पर रहे चुनाव आयोग में भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर आयोग में अंदरूनी खींचतान इस कदर बढ़ गई है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 से ज्यादा बार (एक ही दिन में चार बार) फैसलों और आदेशों पर लिखित में आपत्ति दर्ज कराई है। संधू व जोशी के मुताबिक उनकी जानकारी के बिना ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कई फैसले लिए। इनमें मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने, फार्म-छह में बदलाव तथा मतदाता सूची के डाटाबेस पर नियंत्रण को केंद्रीयकृत करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। जुलाई 2026 में विवाद ज्यादा बढ़ा तो दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। एक प्रकाशित रिपोर्ट में यह राजफाश होने के बाद एक सियासी तूफान भी खड़ा हो गया है।

टीएमसी के 20 सांसदों की योग्यता पर जल्द फैसला लेने स्पीकर: सुप्रीम कोर्ट

भास्कर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की अपेक्षा जताई, लेकिन कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह स्पीकर को निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन मामले के जल्द निपटारे की याद दिला सकती है। याचिका टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने दायर की है। बागी सांसदों की ओर से नोटिस का जवाब चार सप्ताह में दाखिल कर दिया जाएगा।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला कांस्टीट्यूशन बेंच को देने पर दो राय

जागरण के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की (नियुक्ति सेवा शर्तें व कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने की केंद्र की मांग पर विभाजित फैसला दिया है। पीठ के न्यायाधीश दीपांकर दत्ता ने मामला संविधान पीठ को भेजने की मांग खारिज कर दी, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इसका समर्थन किया। मतभिन्नता के कारण अब यह मामला उचित पीठ के गठन के लिए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष पेश किया जाएगा और फिलहाल 2023 का कानून लागू रहेगा जिसमें प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष चयन समिति के सदस्य होते हैं।

पेपर लीक के दावों के बाद आखिरकार बिहार दारोगा भर्ती की मुख्य परीक्षा रद्द

प्रभात खबर के अनुसार बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग (बीपीएसएससी) ने 27 मई को दो पालि में आयोजित हुई दारोगा भर्ती की मुख्य परीक्षा बुधवार को रद्द कर दी. इस आशय से संबंधित पत्र अधिकारिक वेबसाइट पर जारी कर आयोग ने कहा कि नयी परीक्षा तिथि की सूचना अलग से दी जायेगी. अभ्यर्थियों को आधिकारिक वेबसाइट देखने और भ्रामक सूचनाओं से बचने की सलाह भी दी है. माना जा रहा है कि आर्थिक अपराध इकाई (इओयू) की जांच में बड़ी गड़बड़ी की पुष्टि के बाद आयोग ने यह कदम उठाया है. इधर, परीक्षा रद्द होने से 115 दिनों से संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों ने मिठाई बांटकर जमकर जश्न मनाया. आयोग की ओर से तीन सितंबर, 2025 को 1799 पदों पर दारोगा की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था.

गया और पूर्णिया में पेपर लीक

प्रारंभिक परीक्षा के बाद 27 मई को मुख्य परीक्षा पटना, दरभंगा, गयाजी, पूर्णिया और भागलपुर जिले के 59 केंद्रों पर हुई. परीक्षा के दौरान पूर्णिया के राजकीय कन्या उच्च विद्यालय और गयाजी के गया कॉलेज के परीक्षा केंद्र में पेपर लीक से जुड़ा मामला सामने आया. पूर्णिया के वीक्षक मृत्युंजय कुमार पर आरोप लगा कि उसने प्रश्नपत्र की फोटो खींचकर बाहर भेजी. गया के रामपुर में वॉकी-टॉकी गैंग भी पकड़ा गया. मुख्य परीक्षा में गड़बड़ी सामने आने के बाद अभ्यर्थियों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया. 19 जून को परिणाम जारी होने के बाद सामने आया कि सभी 59 केंद्रों में 923 लोग अलग-अलग क्रम में लगातार पास हुए हैं. गया कॉलेज से 471 लोग क्रम में पास हुए. परिणाम में गंभीर अनियमितता की आशंका के चलते अभ्यर्थी गर्दनीबाग में धरने पर बैठ गये. आयोग ने 28 अगस्त को शारीरिक दक्षता परीक्षा स्थगित कर दी. इसके बाद 28 अगस्त को ही इओयू ने केस अपने हाथ में लेते हुए 31 अगस्त को एसआइटी गठित कर दी, जिसकी जांच में भी मुख्य परीक्षा में बड़ी गड़बड़ी की पुष्टि हुई.

11.36 लाख ने कराया था रजिस्ट्रेशन

बिहार पुलिस के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) में दारोगा के 1,799 पदों पर भर्ती के लिए प्रारंभिक परीक्षा में 10,36,702 अभ्यर्थी पंजीकृत थे, जबकि 7,26,231 परीक्षा में शामिल हुए. इनमें से 35,857 अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया था. 27 मई की मुख्य परीक्षा में करीब 34 हजार अभ्यर्थी शामिल हुए.

कुछ और सुर्खियां:

  • पटना में माता सीता महिला विश्वविद्यालय और बेगूसराय में रामधारी सिंह दिनकर विश्वविद्यालय खुलेगा
  • मेघालय की यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के 12 में से आठ विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल
  • 28 से 30 सितंबर तक बैंकों की हड़ताल को देखते हुए सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन 25 सितंबर को ही मिलेगी
  • ओमान तट पर एक कमर्शियल जहाज पर हमले में भारतीय नागरिक की मौत, 19 को बचाया गया
  • जमुई छेड़खानी कांड में हरेराम को भेजा गया जेल एक नाबालिग़ बताया जाने वाला आरोपित निकला वयस्क
  • बगहा के नौरंगिया थाना क्षेत्र में चारा लेने गई महिला सलमा खातून पर बाघ ने हमला किया, मौके पर मौत
  • आईआईटी बॉम्बे में छात्र की आत्महत्या के मामले में प्रोफेसर सूर्य नारायण दुल्ला को छुट्टी पर भेजा गया

अनछपी: पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार के बारे में हमेशा यह कहते थे कि यह एक गरीब राज्य है और अभी उनकी ही पार्टी जनता दल यूनाइटेड के सहयोग से भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सरकार चल रही है लेकिन जिस तरह आयोग, बोर्ड और निगम में राजनीतिक तौर पर होने वाली नियुक्ति वाले पदों के लिए वेतन में ढाई गुना से ज्यादा का इजाफा किया गया है, उस पर यह सवाल जरूर उठाना चाहिए कि क्या बिहार गरीब राज्य नहीं रहा या सरकार यही चाहती है कि बिहार की गरीब जनता के पैसे से सरकार द्वारा मनोनीत नेता लोग भारी भरकम वेतन और भत्ता उठाएं? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि बिहार सरकार ने विभिन्न विभागों के अंतर्गत चलने वाले अयोगों, बोर्ड, निगम, परिषद और समितियों में राजनीतिक तौर पर मनोनीत किए जाने वाले अध्यक्षों, उपाध्यक्षों और दूसरे पदाधिकारियों के वेतन और भत्तों में बेतहाशा बढ़ोतरी की मंजूरी दी है। राज्य कैबिनेट की बैठक में इस बात की मंजूरी दी गई कि मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री का दर्जा प्राप्त पदाधिकारियों का मासिक वेतन ₹25000 से बढ़ाकर सीधे ₹65000 प्रतिमाह कर दिया जाए। आप सोच रहे होंगे कि अगर इन्हें बस इतने पैसे मिलते हैं तो आपके लिए यह जानना भी जरूरी है कि इन्हें दैनिक भत्ता के रूप में पहले ₹1000 में मिलते थे अब इन्हें सीधे ₹3500 मिलेंगे। इसके साथ मेहमानों के सत्कार के नाम पर पहले मिलने वाले 17-18 हजार  रुपये को बढ़ाकर अब 29-30 हजार रुपया कर दिया गया है। इसी तरह बिहार राज्य मछुआरा आयोग के सदस्यों को मानदेय, वाहन भत्ता और मोबाइल रिचार्ज सुविधा के मद में एकमुश्त ₹50000 देने का फैसला किया गया है। सरकार अपने फैसले के पक्ष में यह दलील दे सकती है कि यह वृद्धि 13 सालों के बाद की गई है लेकिन सोचने की बात यह है कि क्या इस तरह की बेतहाशा वृद्धि बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए सही है? एक सवाल यह भी है कि दूसरे राज्यों के तुलना में इस तरह के वेतन भत्तों की क्या स्थिति है? और सबसे अहम बात यह है कि क्या जिस तरह इन राजनीतिक पदों के लिए अंधाधुंध पैसे बढ़ाए गए हैं, उस तरह बिहार की गरीब जनता की आमदनी और उनको दी जाने वाली आर्थिक सहायता बढ़ी है?

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