छ्पी-अनछपी: वक़्फ़ कानून पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त सवाल, मुजफ्फरपुर में चार बच्चे जिंदा जले

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। वक़्फ़ कानून 2025 पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल पूछे और कहा कि क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्ट में मुस्लिम हिस्सा हो सकते हैं। मुजफ्फरपुर में गैस लीक से लगी आग में चार बच्चे जिंदा जल गए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि मुर्शिदाबाद में दंगे भाजपा द्वारा पूर्व नियोजित थे। सुपौल के निलंबित सीओ की संपत्ति आय से 93% अधिक मिली है और उम्र घटाने का भी सबूत मिला है।

और, जानिएगा कि अमेरिका के 30 विश्वविद्यालयों ने दस हज़ार भारतीय छात्रों का एडमिशन लेने से क्यों किया इनकार।

जागरण के अनुसार सुप्रीम कोर्ट वक़्फ़ संशोधन कानून 2025 के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा सकता है। कोर्ट ने कहा कि वह उपयोग के आधार पर वक़्फ़ घोषित संपत्तियों (वक़्फ़ बाइ यूजर) को डीनोटिफाई नहीं किए जाने का अंतरिम आदेश जारी देने के बारे में सोच रहा है। कोर्ट ने केंद्रीय वक़्फ़ परिषद व वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर मुसलमानों को शामिल करने और वक़्फ़ संपत्तियों के बारे में कलेक्टर की शक्तियों पर भी अंतरिम आदेश पारित करने की मंशा रखता है। लेकिन केंद्र सरकार के विरोध और पहले इन मुद्दों पर उनकी दलीलें सुने जाने के अनुरोध पर कोर्ट ने बगैर कोई आदेश जारी किए मामले की सुनवाई गुरुवार तक के लिए टाल दी। बुधवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना के अलावा जस्टिस संजय कुमार और के विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। दो घंटे तक चली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों से कई सवाल किए। कोर्ट ने केंद्रीय वक़्फ़ काउंसिल और वक़्फ़ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने को लेकर पूछा कि क्या हिंदू धर्मार्थ ट्रस्ट में मुसलमानों को शामिल करेंगे? खुलकर बताइए। चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालतों द्वारा वक़्फ़ घोषित की गई संपत्तियों को डीनोटिफाई नहीं किया जाना चाहिए चाहे वक़्फ़ बाय यूजर हों या वक़्फ़ बाय डीड।

मुजफ्फरपुर में चार बच्चे जिंदा जले

भास्कर के अनुसार मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के बरियारपुर थाना स्थित रामपुर मनी गांव में बुधवार की सुबह आग लग गई। भीषण अगलगी में सगे भाई बहन समेत चार मासूम जिंदा जल गए। महादलित बस्ती की 52 झोपड़ियां भी रख हो गईं। कई बच्चों को आग की लपटों से बचाकर निकाला गया। घरेलू गैस के लीकेज से लगी आग में बस्ती में तांडव मचाया। हालांकि हिन्दुस्तान ने लिखा है कि बिजली पोल के डीबी बॉक्स में शॉर्ट सर्किट से निकली चिंगारी से पहले वीरेंद्र पासवान के घर में आग लगी। देखते-देखते आग ने 65 घरों को अपनी चपेट में ले लिया। घटना के समय टोले के सारे लोग गेहूं कटनी में चौर में थे। तेज हवा ने चंद मिनट में पूरी बस्ती को आग की चपेट में ले लिया। लपटों के बीच एक-एक करके घर ढहते चले गए। दो गैस सिलेंडर भी फटे। दो घंटे की मशक्कत के बाद 30 दमकल ने आग पर काबू पाया।

ममता ने मुर्शिदाबाद दंगे के लिए भाजपा को दोषी ठहराया

प्रभात खबर के अनुसार पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद में हाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा को बुधवार को पूर्व नियोजित करार दिया। साथ ही उन्होंने बीएसएफ के एक वर्ग, गृह मंत्रालय के तहत आने वाली केंद्रीय एजेंसियों तथा भाजपा पर कथित तौर पर बांग्लादेश से सीमा पर घुसपैठ बढ़ाकर तनाव बढाने का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं के साथ एक बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी से वक़्फ़ संशोधन अधिनियम को लागू नहीं करने का आग्रह किया और चेतावनी दी कि यह कानून देश को विभाजित करेगा।

सुपौल के निलंबित सीओ की संपत्ति आय से 93% अधिक

स्पेशल विजिलेंस यूनिट (एसयूवी) ने सुपौल के निलंबित अंचलाधिकारी (सीओ) प्रिंस राज के शेखपुरा और मधुबनी स्थित ठिकानों पर दबिश दी। आय से अधिक संपत्ति को लेकर दर्ज मामले में यह छापेमारी हुई। सीओ की कुल संपत्ति का 93% हिस्सा वैध आय से अधिक पाया गया है। प्रिंस राज कोसी कमिश्नरी में निलंबन प्रतिनियुक्ति पर हैं। उन्होंने 2019 में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में योगदान दिया। एसयूवी के अनुसार प्रारंभिक जांच में बड़ी संख्या में बेनामी संपत्ति, महंगी गाड़ियां और बैंक खातों में संदिग्ध लेन-देन के प्रमाण मिले हैं। सरकारी सेवा में रहते हुए सीओ ने गलत तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की जो उनके वेतन और आय के अन्य ज्ञात स्रोतों की तुलना में बहुत अधिक है। प्रिंस की पत्नी अंकु गुप्ता शेखपुरा के अरियरी अंचल में सीओ हैं। प्रिंस राज का असली नाम धर्मेंद्र कुमार है। उसने मैट्रिक का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर बीएससी की परीक्षा पास की है। इस तरह उसने करीब 4 साल अपनी जन्म तिथि का अवैध लाभ लिया।

दस हज़ार भारतीय छात्रों का अमेरिका में एडमिशन रुका

भास्कर के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आर्डर भारतीय छात्रों के अमेरिकन ड्रीम को चकनाचूर कर रहे हैं। भास्कर पड़ताल में सामने आया कि येल, ब्राउन, कार्नेल, स्टैनफोर्ड, बोस्टन और वॉशिंगटन जैसी 30 यूनिवर्सिटी ने इस साल लगभग 30000 भारतीय छात्रों का एडमिशन लेने से इनकार कर दिया है जबकि पहले उन्होंने एडमिशन का ऑफर लेटर दे दिया था। इन छात्रों में साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स फैकल्टी में आवेदन दिया था। छात्रों के अनुसार एडमिशन के लिए ऑफर लेटर के आधार पर जुलाई में उनका एडमिशन होना था लेकिन मार्च के अंत में यूनिवर्सिटी ने उनके ऑफर लेटर को रद्द कर दिया। यूनिवर्सिटी ने इसका कारण ट्रंप सरकार की और से विदेशी छात्रों को वीजा जारी करने में सख्ती और फंड की कमी बताई।

कुछ और सुर्खियां:

  • मुकेश सहनी बोले- हम भाजपा के साथ जाने वाले नहीं, पूर्व आईपीएस अधिकारी नूरुल हुदा ने विकासशील इंसान पार्टी ज्वाइन की
  • जस्टिस बीआर गवई सुप्रीम कोर्ट के अगले मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) होंगे
  • नालंदा जिले के सिलाव में सनकी युवक ने युवती और उसकी मां की हत्या कर खुद को मारी गोली
  • वक़्फ़ संशोधन कानून को लोगों तक पहुंचाएगी भारतीय जनता पार्टी
  • कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सरकारी ठेकों में मुसलमानों को 4% आरक्षण देने वाले विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा
  • बिहार पुलिस में 19838 पदों पर सिपाही बहाली को लेकर आवेदन की तारीख 25 अप्रैल तक बढ़ी

अनछपी: कहते हैं कि भाषा का कोई धर्म नहीं होता लेकिन भारत के बदले हुए माहौल में किस चीज को कब सांप्रदायिक रंग दे दिया जाए कहना मुश्किल है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू भाषा को लेकर जो आदेश पारित किया है वह स्वागत योग्य है। हालांकि अफसोस की बात है कि हिंदी के अखबारों ने उर्दू भाषा के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अच्छी जगह नहीं दी लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि हिंदी और उर्दू को जुडवां बहनें कहा जाता है। अगर लिपि को छोड़ दिया जाए तो एक दूसरे की भाषा को समझने में लोगों को कोई खास परेशानी नहीं होती है। सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू को ‘गंगा जमुनी तहजीब’ का बेहतरीन नमूना बताते हुए बिल्कुल सही कहा कि यह भाषा इसी धरती पर पैदा हुई है लेकिन सांप्रदायिक तत्वों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि यह मानना अजीब लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानना विविधता में एकता के लिए दुखद है। भारत में जन्मी उर्दू के लिए सांप्रदायिक तत्वों के मन में कितनी नफरत है कि महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइन बोर्ड में उर्दू के इस्तेमाल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इसके लिए दायर याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मंगलवार को कहा कि भाषा कोई धर्म नहीं है, यह संस्कृति है। कोर्ट ने कहा कि भाषा किसी समुदाय और लोगों की सभ्यतागत यात्रा को मापने का पैमाना है। उर्दू का मामला भी ऐसा ही है। कोर्ट ने ठीक ही कहा कि औपनिवेशिक शक्तियों ने धर्म आधार पर दो भाषाओं को बांट फायदा उठाया। कोर्ट ने यह नहीं कहा लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं कि अब यही काम सांप्रदायिक तत्व कर रहे हैं। यहां याद दिलाना जरूरी लगता है कि कुछ समय पहले उत्तराखंड में रेलवे के बोर्ड्स से उर्दू को हटा दिया गया और इसकी जगह संस्कृत में स्टेशनों के नाम लिखना शुरू किया गया। समझने की बात यह है कि हिंदी और संस्कृत में जगह के नाम लगभग एक ही तरीके से लिखे जाते हैं। ऐसे में उत्तराखंड में सांप्रदायिक नफरत की वजह से ही उर्दू को रेलवे स्टेशनों से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इधर उत्तर प्रदेश में बहुत से उर्दू शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई हालांकि वह देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती थी। हिंदी से उर्दू के शब्दों को निकालने की यह सोच भाषा को मजबूत नहीं बल्कि कमजोर बनाती है।

 

 

 691 total views

Share Now