छपी-अनछपीः तेजस्वी ने ओवैसी को दिया झटका, उद्धव को अपनों से मिला झटका

बिहार लोक संवाद डाॅट नेट, पटना। राजनीति में दलबदल और झटके की खबर कोई अजूबा बात नहीं होती लेकिन यह लोकतंत्र की कमजोरी और सरकार के भविष्य का मजबूत संकेत जरूर होती है। आज के अखबारों में इन्हीं दो राजनैतिक झटकों की खबर छायी हुई है।
पहली खबर तो बिहार में असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को मिले झटके की है और दूसरी महाराष्ट्र में बागियों के बाद सुप्रीम कोर्ट से उद्धव ठाकरे को मिले की झटके की खबर है जिन्होंने बुधवार की रात को नाटकीय अंदाज में फेसबुक पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोट ने एक तरफ उप विधानसभा अध्यक्ष को बागियों को 11 जुलाई तक अयोग्य घोषित करने से रोक दिया और दूसरी ओर सदन में शक्ति परीक्षण पर रोक लगाने की अर्जी को खारिज कर दिया।
’हिन्दुस्तान’ की सबसे अहम खबर की सुर्खी है- तेजस्वी ने ओवैसी को दिया झटका, चार विधायक तोड़े। भास्कर की हेडिंग है- डेढ़ साल में चैथा दलबदल, ओवैसी के 5 में से 4 एमएलए ने थामी लालटेन। जागरण ने इस खबर को उतनी तवज्जो नहीं दी है। प्रभात खबर में यह खबर लीड है।
जागरण की लीड है- महाराष्ट्र में शक्ति परीक्षण से पहले उद्धव ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी। भास्कर की हेडिंग है- दो साल में दूसरी बार भाजपा राज तय। ’हिन्दुस्तान’ ने इसे दूूसरी सबसे बड़ी खबर बनाया है।
प्रभात खबर ने 15 जुलाई तक सीबीएसई की 10वीं व बारहवीं के रिजल्ट आने की खबर प्रमुखता से छापी है। हिन्दुस्तान ने उपराष्ट्रपति का चुनाव 6 अगस्त को होने की सूचना पहले पेज पर दी है।
पटना में एक बार फिर सौ से अधिक कोरोना के मरीज मिले हैं। यह खबर भी प्रमुखता से छपी है।
जागरण ने अपने दूसरे पेज पर लीड लगायी है- पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठन से जुड़े उदयपुर में बर्बरता के तार।
शुरुआती बारिश में ही एनएमसीएच के मेडिसीन वार्ड में पानी घुसने की खबर भास्कर और जागरण में प्रमुखता से लगी है।
जागरण ने खबर दी है कि खाने-पीने की चीजों से होटल में ठहरना तक महंगा।
अनछपीः सीमांचल के विकास के नाम पर चुने गये एआईमएआईएम के पांच में से चार विधायकों के टूटकर राजद में मिलने की खबर पर तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद चाहे जो कहें, हकीकत यह है कि इलाके के लोग इनकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं मगर यह बात अखबारों में नहीं दिखती। दूसरी बात, कि भाजपा को ओवैसी की पार्टी के सदस्य के राजद में मिलने पर जो आपत्ति है वह नैतिकता के आधार पर नहीं है क्योंकि वह खुद वीआईपी के विधायकों को तोड़कर अपने साथ मिला चुकी है। ऐसे में भाजपा का असल दर्द यह है कि वह अब विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी नहीं रही। वह पहले भी दूूसरे स्थान पर थी लेकिन मुकेश सहनी की पार्टी के विधायकों पर अपना हाथ साफ कर वह पहले नंबर की पार्टी बनी थी। यह सारा खेल इसीलिए तो चल रहा कि अगर कल नीतीश कुमार भाजपा से अलग हों तो राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने की दावत दें और एक बार सकरार बनने पर और जोड़ तोड़ करने का मौका मिल जाए।

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