छ्पी-अनछपी: ईरान में ख़ामेनेई समर्थकों का विशाल प्रदर्शन, जहां चुनाव- वहीं ईडी

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच सोमवार को हजारों सरकार समर्थक सड़कों पर उतरे। पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की बढ़ती सक्रियता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। नाबालिग को जेल भेजने के मामले में पटना हाई कोर्ट ने पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

पहली ख़बर

हिन्दुस्तान के अनुसार ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच सोमवार को हजारों सरकार समर्थक सड़कों पर उतरे। उन्होंने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन को चुनौती देने वाले प्रदर्शनों के बाद अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। ईरानी सरकारी टेलीविजन ने राजधानी तेहरान के एंघेलाब चौक की ओर जा रहे सरकार समर्थक प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें दिखाईं। इस चौक को ‘इस्लामिक क्रांति’ चौक के नाम से भी जाना जाता है। सरकारी टेलीविजन ने सरकार के समर्थन में प्रदर्शन को ‘अमेरिकी-यहूदी आतंकवाद के खिलाफ ईरानियों का विद्रोह’ करार दिया। देश की खराब अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों में व्याप्त आक्रोश विरोध-प्रदर्शनों में तब्दील हो गया था। सरकारी टेलीविजन ने देशभर में ऐसे प्रदर्शनों की तस्वीरें प्रसारित कीं, जिससे यह संकेत देने की कोशिश की गई कि देश ने विरोध पर काबू पा लिया है।

ईरान अमेरिका से वार्ता को तैयार

जागरण के अनुसार ईरान ने कहा है कि वह अमेरिका से वार्ता के लिए तैयार है लेकिन हमला हुआ तो उसका पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा है कि ईरान वार्ता करना चाहता है, इसलिए अमेरिकी अधिकारियों से उसके प्रतिनिधियों की वार्ता हो सकती है। वैसे वह ईरान के विपक्ष के नेताओं के संपर्क में हैं। लेकिन सैन्य कार्रवाई का विकल्प उनके पास है। इस बीच राजधानी तेहरान और अन्य ईरानी शहरों में विरोध प्रदर्शन और हिंसा जारी है। इस हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 599 हो गई है, इसमें 89 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं।

जहां चुनाव- वहीं ईडी

भास्कर ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की बढ़ती सक्रियता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ईडी का काम आर्थिक अपराधों की जांच करना और काले धन व मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाना है, मगर कई बार उसकी कार्रवाई की टाइमिंग सवालों में आ जाती है। ताजा मामला कोलकाता में आई-पैक पर छापेमारी का है, जिसमें सीएम ममता बनर्जी और ईडी आमने-सामने है। बंगाल में इस साल मई से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले, 4 साल में 3 राज्यों (झारखंड, दिल्ली, महाराष्ट्र) में ऐसा हो चुका है, जब ईडी ने पुराने मामलों में चुनाव से कुछ समय पहले बड़ी कार्रवाई की। इस साल बंगाल समेत तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी के साथ इन राज्यों में ईडी ने पुराने मामलों की फाइलें खोलना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु में शराब, रियल एस्टेट और शेल कंपनियों से जुड़े केस सत्ताधारी डीएमके के लिए परेशानी बने हैं। असम में कांग्रेस और एआईयूडीएफ से जुड़े नेताओं पर कार्रवाई का डर चुनावी फंडिंग नेटवर्क पर असर डाल रहा है। केरल में सोना तस्करी और सहकारी बैंक मामलों से एलडीएफ सरकार घिरी हुई है। पुडुचेरी जैसे छोटे राज्य में भी कारोबारी और राजनीतिक गठजोड़ पर एजेंसी की नजर है। यह पैटर्न नया नहीं है। झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद दबाव बना। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने आप का ताना-बाना बिगाड़ दिया। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी से जुड़े मामलों के बीच दल टूटे और सरकारें गिरीं।

नाबालिग को जेल भेजने पर पांच लाख का जुर्माना

हिन्दुस्तान के अनुसार पटना हाईकोर्ट ने मधेपुरा के एक नाबालिग छात्र को जेल भेजने पर राज्य सरकार पर पांच लाख का जुर्माना लगाया है। 15 हजार बतौर मुकदमा खर्च पीड़ित को देने को कहा है। सरकार जुर्माना राशि दोषी अधिकारियों से वसूल सकती है। सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि छह माह के भीतर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करे। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और रीतेश कुमार की खंडपीठ ने आपसी विवाद में हुई मारपीट में मधेपुरा के पुरैनी थाना में दर्ज केस की सोमवार को सुनवाई की। कोर्ट को बताया गया कि साढ़े 15 साल के नाबालिग को बाल गृह भेजने के बजाए जेल भेज दिया गया। जबकि आरोप पत्र में किशोर का नाम नहीं था। मजिस्ट्रेट ने बगैर देखे उसे जेल भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट भी अवैध गिरफ्तारी से बचाने में विफल रहे। उसे करीब ढाई माह जेल में रहना पड़ा। डीआईजी के निर्देश पर छात्र को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

डॉक्टर बनने आई छात्रा को इंसाफ दिलाने की लड़ाई सड़क पर

प्रभात ख़बर के अनुसार पटना के चित्रगुप्त नगर के मुन्नाचक स्थित एक निजी गर्ल्स हॉस्टल में रहकर मेडिकल एंट्रेंस के लिए ‘नीट’ की तैयारी कर रही छात्रा की मौत के मामले की गुत्थी सात दिन बाद भी नहीं सुलझ पायी. सोमवार को इस मामले में एक नया मोड़ तब आ गया, जब परिजनों ने युवती का अंतिम संस्कार रोक दिया. परिजन अर्थी लेकर सीधे करगिल चौक पहुंचे और शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. परिजनों का कहना है कि शव यात्रा के दौरान एक डॉक्टर का फोन आया. खुद को पीएमसीएच में कार्यरत बताते हुए डॉक्टर ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर चोट के निशान मिलने के साथ दुष्कर्म के संकेत भी मिले हैं. मालूम हो कि युवती छह जनवरी को अपने हॉस्टल में बेहोश पायी गयी थी. इसके बाद से वह कोमा में चली गयी. पांच दिन कोमा में रहने के बाद रविवार को उसकी मौत हो गयी.

कुछ और सुर्खियां:

  • बिहार के एक करोड़ 16 लाख 4685 सामाजिक सुरक्षा पेंशनधारकों के दिसंबर की पेंशन के लिए 1289 करोड़ चार लाख रुपये जारी
  • जीपीओ पटना के आधार सेवा केंद्र में तीन और काउंटर खुलेंगे, पहले से 10 काउंटर कम कर रहे
  • शास्त्र और पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति 14 को, सुधा 36 लाख लीटर दूध और 11 लाख किलो दही बेचेगा
  • नवादा के अकबरपुर प्रखंड के नेमदारगंज में बोरसी के धुएं से सोए युवक की मौत

अनछपी: पिछले रविवार को राज्यपाल और चांसलर आरिफ मोहम्मद खां ने सभी विश्वविद्यालय के कुलपतियों को निर्देश दिया है कि सभी विश्वविद्यालय अपने क्षेत्र के पांच-पांच गांवों को गोद लेकर उन्हें शैक्षणिक रूप से उन्नत बनाएं। इस निर्देश पर हैरत होती है क्योंकि विश्वविद्यालय खुद अपनी सही अवस्था में नहीं है और वहां हर तरह की गड़बड़ियां आम हैं। उदाहरण के तौर पर बैठक के दौरान बताया गया कि जयप्रकाश नारायण विवि छपरा और केएसडीएस में विभिन्न विषयों में परीक्षा और रिजल्ट प्रकाशन में 14 माह से 20 माह तक देर हो रही है। वहीं, ललित नारायण मिथिला विवि दरभंगा, आर्यभट्ट ज्ञान विवि, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर और पूर्णिया विवि में शैक्षणिक और परीक्षा कैलेंडर में 6 से 8 माह तक की देर हो रही है। सही समय पर परीक्षा और रिजल्ट निकालने की बुनियादी जिम्मेदारी भी विश्वविद्यालय नहीं निभा पा रहे हैं और यह कोई एक दो साल की बात नहीं बल्कि लंबे समय से यही स्थिति है। इसी तरह यह भी बताया गया कि विश्विवद्यालयों के पास 1371 करोड़ की उपयोगिता प्रमाण पत्र देना लंबित है। शिक्षा विभाग लगातार यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट देने की मांग करता रहा है लेकिन इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला है। चांसलर ने जिन गांवों को गोद लेने की बात कही है, वहां के लोगों को शिक्षा से लेकर विभिन्न मुद्दों पर जागरूक करने करने की जिम्मेदारी दी गयी गांव ताकि वह गांव आदर्श गांव के रूप में पहचाने जाएं। जाहिर है ऐसी चिकनी चुपड़ी योजनाओं का तब तक कोई मतलब नहीं रह जाता जब तक कि विश्वविद्यालय खुद अपनी स्थिति को ठीक करें। यह बात भी याद रखने की है कि आज से 10 साल पहले लोकसभा सांसदों को गांव को गोद लेने की जिम्मेदारी दी गई थी लेकिन शायद ही कोई ऐसा गांव हो जिसे हम आदर्श के रूप में पेश कर सकें। इसलिए बिहार के विश्वविद्यालय को सुधारने की जिम्मेदारी पूरी करनी है तो असली समस्या पर ध्यान देना चाहिए, आदर्शवादी योजनाओं की घोषणा से यह स्थिति नहीं सुधर सकती।

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