बिहार लोक संवाद डाॅट नेट
पटना, 28 दिसंबर: शेर शाह ने 1540 ईसवी से लेकर 1545 ईसवी तक भारत पर शासन किया था। कहते हैं, उस दौर के इतिहास में शेरशाह का कोई सानी नहीं था। मुगलों के दांत खट्टे करने वाले और अपनी प्रजा के लिए खुशहाली लाने वाले इस बादशाह की अनेक धरोहरें बिहार के सासाराम में हैं। लेकिन अधिकांश असुरक्षित और उपेक्षित हैं। उन्हीं में से एक सोन नदी पर चार किलोकिमीटर लंबा पत्थर का काॅज़वे यानी सेतु मार्ग है। वर्तमान समय में यह रोहतास ज़िले के डिहरी और औरंगाबाद ज़िले के बारून के बीच स्थित है।
ये सेतुमार्ग शेरशाह के मशहूर ग्रांड ट्रंक रोड का हिस्सा था। इस काॅज़वे की खोज आक्र्यालाॅजिकल सर्वे आफॅ़ इंडिया ने दो हज़ार सोलह में की थी।
अभी हाल ही में अंग्रेज़ी अख़बार ‘दे टेलीग्राफ़’ ने ऐतिहासिक महत्व के इस काॅज़वे की दुर्दशा पर एक रिपोर्ट पब्लिश की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बालू माफ़िया इस सेतु मार्ग का इस्तेमाल सोन नदी से अवैध बालू खुदाई और उसकी ढुलाई के लिए कर रहे हैं। इसकी वजह से इस काॅज़वे के कई हिस्सों को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है। बालू ढोने वाली गाड़ियों की वजह से इसके कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। पत्थरों के बड़े-बड़े स्लैब अपनी जगह से ग़ायब हैं।
हैरत की बात है कि ये सब तब हो रहा है, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आक्र्यालाॅजिकल साइट्स का लगातार दौरा कर रहे हैं और अपने अधिकारियों को उनके संरक्षण का निर्देश दे रहे हैं। लेकिन उन्होंने पांच सौ साल पहले निर्मित इस बदहाल काॅज़वे का दौरा करने की अब तक ज़हमत नहीं की है।
ऐसे में अपनी नागरिक ज़िम्मेदारियों को महसूस करते हुए बिहार लोक संवाद डॉट नेट के समी अहमद ने सासाराम की दो शख्सियतों से इस काॅज़वे के इतिहास, महत्व और इसके संरक्षण पर तफ़्सील से बात की। इनमें से एक मेहमान डॉक्टर श्याम सुंदर तिवारी हैं जो सासाराम के इतिहास और इसकी धरोहरों के विशेषज्ञ हैं। हमारे दूसरे मेहमान हैं वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र किशोर। वे पर्यावरण और धरोहरों पर विशेष नजर रखते हैं। आइए देखते हैं उनका पूरा इंटरव्यू।
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