छ्पी-अनछपी: एनडीए 200 के पार, मुस्लिम विधायक केवल 11

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी तमाम नाकामियों को दरकिनार करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को न केवल जीत दिलाई बल्कि विपक्षी महागठबंधन को मटियामेट कर दिया। बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार मुसलमान विधायकों की संख्या घटकर सबसे कम 11 हो गई है। विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटों में से 34 पर एनडीए ने कब्जा जमाया।

पहली ख़बर: 

हिन्दुस्तान के अनुसार नीतीश कुमार के सिर 10वीं बार बिहार का ताज सजेगा। उनके नेतृत्व में एनडीए को राज्य की जनता ने प्रचंड बहुमत सौंपा है। ‘इंडिया’ गठबंधन का सूपड़ा साफ हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव परिणाम आने के बाद कहा भी कि बिहार की जनता ने गर्दा उड़ा दिया। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारी बहुमत से जीत देने के लिए राज्य की जनता को धन्यवाद दिया है तथा आभार प्रकट किया है। बिहार की जनता ने 243 सीटों में से तकरीबन 83 फीसदी सीटें एनडीए की झोली में देकर नीतीश कुमार को 10वीं बार मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। एनडीए ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 202 सीटें अपनी झोली में डाल ली है। वहीं तेजस्वी यादव के चेहरे पर चुनाव लड़ने वाले ‘इंडिया’ गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। विपक्षी गठबंधन के खाते में महज 35 सीटें गई हैं। शुक्रवार रात करीब साढ़े 11 बजे चुनाव आयोग ने सारे नतीजे जारी कर दिये। इसके अनुसार, भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी जबकि 85 सीटों के साथ जदयू दूसरे नम्बर पर है। 19 सीटें लोजपा आर, हम को 5 जबकि रालोमो के हिस्से 4 सीटें आई हैं। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल राजद को 25, कांग्रेस को 6, भाकपा माले को 2, माकपा और आईआईपी को एक-एक सीट मिली है। वहीं भाकपा और वीआईपी अपना खाता भी नहीं खोल सकी। दोनों प्रमुख गठबंधनों से इतर, एआईएमआईएम ने 2020 के अपने प्रदर्शन को दोहराते हुए फिर पांच सीटों पर जीत दर्ज कराई है। वहीं, जोर-शोर से चुनाव में उतरी प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज के अभियान को जनता ने कोई खास तवज्जो नहीं दी। उसका खाता भी नहीं खुल पाया।

केवल 11 मुस्लिम उम्मीदवार जीत सके

प्रभात ख़बर के अनुसार 18वीं विधानसभा में केवल 11 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं। इनमें से पांच एआईएमआईएम हैं; अमौर से अख्तरुल ईमान, बहादुरगंज से मो. तौसीफ आलम, बायसी से गुलाम सरवर, जोकीहाट से मो. मुर्शीद आलम व कोचाधामन से मो. सरवर आलम। किशनगंज से कांग्रेस के मो. कमरुल होदा, अररिया से कांग्रेस के आबीदुर रहमान व चैनपुर से जदयू के मो. जमां खान जीते हैं। ध्यान रहे कि 2020 में 19 और 2015 में 24 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। इस बार महागठबंधन ने 29 और एनडीए ने पांच मुसलमान उम्मीदवार बनाए थे। एनडीए में बीजेपी ने कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं दिया था जेडीयू ने चार मुस्लिम उम्मीदवार दिए जिनमें से केवल एक जीत पाए और चिराग पासवान की पार्टी ने एक मुस्लिम उम्मीदवार दिया था जो जीत नहीं पाए। राजद ने 18 मुसलमान उम्मीदवार बनाए थे जिनमें तीन को जीत मिली। सीपीआईएमएल ने दो मुसलमानों को टिकट दिए थे और दोनों हार गए। इनमें से एक कटिहार जिले की बलरामपुर सीट से दो बार जीते महबूब आलम भी शामिल हैं। 2020 में राजद के आठ, कांग्रेस के चार, सीपीआईएमएल के एक, एआईएमआईएम के पांच और बीएसपी के एक मुसलमान उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी।

40 रिज़र्व सीटों में 34 पर एनडीए की जीत

प्रभात खबर के अनुसार बिहार में 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित हैं. एनडीए ने इन सीटों में से इस बार सर्वाधिक 34 सीट जीत कर इंडिया गठबंधन को चौंका दिया है. एनडीए का सुरक्षित सीट जीतने का स्ट्राइक रेट 85 फीसदी रहा. महागठबंधन को केवल छह सीटों से संतुष्ट रहना पड़ा. जदयू को सुरक्षित सीटों में सबसे अधिक 14 सीटें हासिल हुई हैं. राजद को 11, लोजपा (राम विलास) को पांच और हम (सेक्यूलर) को चार सीटें मिली हैं. इस तरह उन्हें कुल 34 सीटों पर जीत मिली है. जबकि महागठबंधन में राजद को चार सीटें और दो सीटें कांग्रेस को मिली हैं.

29 महिला विधायक चुनी गईं, 26 एनडीए की

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में 29 महिला प्रत्याशी जीती हैं. हैं. इनमें 26 एनडीए से, जबकि तीन महागठबंधन (राजद) से हैं. एनडीए ने इस बार 35 महिलाओं टिकट दिया. इनमें भाजपा-जदयू ने 13-13, लोजपा-रा ने छह, हम ने दो व रालोमो ने एक महिला को टिकट दिया था. लेकिन, लोजपा-रा की एक महिला उम्मीदवार सीमा सिंह का मढ़ौरा से पर्चा रद्द होने के बाद एनडीए से 34 ही महिला प्रत्याशी मैदान में रह गयी थीं. इनमें भाजपा की 10, जदयू की 10. लोजपा की तीन, हम की दो और सलोमो की एक महिला प्रत्याशी को जीत मिली. इनमें सबसे बड़ी जीत ‘औराई से भाजपा की रमा निषाद को मिली है. उन्होंने वीआइपी के बोगेंद्र सहनी को 57 हजार से अधिक वोटों से हराया है. वहीं, जमुई से श्रेयसी सिंह ने राजद के शमशाद आलम को 54 हजार से अधिक वोटों से हराया है. जदयू से सबसे अधिक वोटों से जीत दर्ज करनेवालों में धमदाहा से लेशी सिंह रहीं. उन्होंने जदयू से राजद में आये पूर्व सांसद संतोष कुशवाहा को 55000 से अधिक वोटो से हराया.

किस जाति के कितने विधायक

भास्कर के अनुसार सबसे ज्यादा राजपूत जाति से 32 विधायक चुने गए हैं, यह संख्या 2020 में 18 थी। इसके बाद यादवों की संख्या है जो 2020 में 55 सीटों पर जीते थे लेकिन इस बार केवल 28 सीट पर जीत पाए हैं। 2020 में कुर्मी विधायकों की संख्या 10 थी जो 2025 में 25 हो गई है। 2010 में कुशवाहा विधायकों की संख्या 16 थी जो अब 23 हो गई है। वैश्य समुदाय के विधायक 2020 में 22 थे, अब 26 हो गए हैं। भूमिहार जाति से 2020 में 17 विधायक थे जो बढ़कर 23 हो गए हैं। 2020 में 12 ब्राह्मण विधायक थे जो बढ़कर 14 हो गए हैं। अगड़ी जातियों में केवल कायस्थ विधायकों की संख्या कम हुई है जो 2020 में तीन थे, अब घट कर दो रह गए हैं।

15 जिलों में महागठबंधन का खाता नहीं खुला

इस विधानसभा चुनाव में एनडीए की एसी सुनामी आई कि महागठबंधन 15 जिलों में एक भी सीट जीत नहीं पाया। 38 जिलों में जहां 15 जिलों में जहां राजद, कांग्रेस, माले, सीपीआईएम, सीपीएम, वीआईपी, आईईआईपी का एक भी विधायक नहीं जीता, वहीं 10 जिलों में एक-एक विधायक ही जीत पाए। यानी महागठबंधन और एआईएमआईएम केवल 13 जिलों में एनडीए का थोड़ा बहुत मुकाबला कर सका। महागठबंधन ने सबसे बेहतर प्रदर्शन सारण में किया जहां उन्हे तीन सीट मिली। एनडीए का सबसे खराब प्रदर्शन किशनगंज में रहा जहां चार सीट में केवल ठाकुरगंज में जीत मिली।

कुछ और सुर्खियां:

  • 29 मंत्रियों में 28 ने जीत हासिल की, पिछली बार निर्दलीय जीतकर मंत्री बने सुमित सिंह जदयू के टिकट पर हारे
  • एनडीए छोड़कर आरजेडी में गए संजीव कुमार, कौशल यादव, पूर्णिमा यादव, सूरजभान की पत्नी, रेणु कुशवाहा, संतोष कुशवाहा और बृज किशोर बिंद हारे
  • इस बार जदयू के विजेंद्र प्रसाद यादव (79 साल) सबसे उम्रदराज और अलीपुर से भाजपा की मैथिली ठाकुर (25 साल) सबसे कम उम्र की विधायक
  • झारखंड की घाटशिला सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार सोमेश चंद्र सोरेन जीते, पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के बेटे भाजपा के उम्मीदवार को हराया

अनछपी: इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि 2025 के बिहार में नीतीश कुमार इतनी सीटें ले आएंगे और एनडीए 200 से ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल करेगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। एक एग्जिट पोल वाले यह बात जरूर कह सकते हैं कि उन्होंने 209 सीटों का अनुमान लगाया था लेकिन उसे पर शायद ही किसी को विश्वास हुआ हो। मोटे तौर पर देखा जाए तो एनडीए चुनाव की तारीख का ऐलान होने से पहले जीत चुका था और महागठबंधन की हार तय हो चुकी थी। एसआईआर और वोट चोरी के आरोप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन याद रखने की बात यह है कि नीतीश कुमार की सरकार ने जून-जुलाई से जिस तरह की घोषणाएं की हैं उनका सबसे ज्यादा असर रहा है। इन सब में महिलाओं के खाते में सीधे ₹10000 भेजना सबसे ज्यादा कारगर साबित बताया जाता है। लेकिन यह अकेली वजह नहीं है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाना और 125 यूनिट बिजली मुफ्त देना भी उसी में शामिल है। इसके अलावा ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों के मानदेय में दोगुना और तीन गुना इजाफा करना भी नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ पाए जा रहे गुस्से को कम करने में कामयाब हुआ। इसी तरह डोमिसाइल नीति लागू करने और बेरोजगार युवाओं को ₹1000 मासिक की मदद देने की घोषणा भी जनता के गुस्से को कम करने में मददगार साबित हुई। यह कहा जा सकता है कि सरकार में रहने का फायदा नीतीश कुमार ने उठाया जो तेजस्वी यादव के लिए संभव नहीं था। फिर भी जो बात तेजस्वी यादव और कांग्रेस पार्टी के लिए जो संभव था उसमें भी वह नाकाम नजर आए। सबको पता है कि सीट बंटवारे को लेकर महागठबंधन में आखिर वक्त तक एक राय नहीं बनी। यहां तक कि सीट संख्या की घोषणा होने से पहले चुनाव चिन्ह बांट दिए गए। 11 सीटों पर कथित फ्रेंडली फाइट हुई और वह सभी सीटें एनडीए की झोली में गईं। नीतीश कुमार ने जो लोक लुभावनी घोषणाएं कीं और तेजस्वी यादव ने जो गलतियां कीं, वह अपनी जगह, लेकिन जनसुरज पार्टी के प्रशांत किशोर का जो हाल हुआ वह स्वस्थ राजनीति करने वालों के लिए एक सबक है। थोड़ी देर के लिए अगर यह मान भी लिया जाए कि लोगों को जंगल राज की वापसी का डर था इसलिए उन्होंने महागठबंधन को वोट नहीं दिया लेकिन प्रशांत किशोर के साथ तो ऐसी कोई बात नहीं थी फिर भी उनका कोई उम्मीदवार नहीं जीत पाया। इस चुनाव का एक अफसोसनाक पहलू यह भी है कि जो पार्टी गरीबों की पार्टी मानी जाती थी, यानी सीपीआईएमएल, उसका भी बुरा हाल हो गया। इस चुनाव में अगर सबसे कम पैसे खर्च कर लड़ने वाली कोई पार्टी थी तो यही थी लेकिन इस बात का सबको अंदाजा है कि कम पैसे खर्च कर चुनाव जीतना सबसे मुश्किल काम है।

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