बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। गुजरात में 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मंगलवार को स्क्रीनिंग कराने वालों पर पथराव किया गया और जेएनयू प्रशासन ने भी इसमें खलल डालने की कोशिश की। यह चर्चित खबर अखबारों में दब गई है। पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सैंकड़ों मदरसों की जांच का आदेश दिया है, जिसे प्रमुखता दी गई है।
बीबीसी डॉक्यूमेंट्री संबंधी खबर जागरण में साफ हेडिंग के साथ है: जेएनयू में बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग से पहले कटी लाइट, हंगामा। हिन्दुस्तान ने लिखा है: विवादित वृत्तचित्र के प्रदर्शन को लेकर जेएनयू में टकराव। जागरण ने लिखा है: जेएनयू प्रशासन की सख्त चेतावनी के बावजूद छात्र संघ कार्यालय पर एकत्र होकर वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े छात्रों ने 2002 के गुजरात दंगों पर बनी ‘इंडिया: द मोदी क्वेश्चन’ नामक बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को देखा। छात्र डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग छात्र संघ कार्यालय में लगे प्रोजेक्टर पर न कर सकें, इसके लिए जेएनयू प्रशासन ने कार्यालय के आसपास की बिजली कटवा दी थी। इसके साथ ही वहां जैमर लगाकर इंटरनेट सेवा भी बाधित कर दी गई थी मगर छात्रों ने अपने फोन और लैपटॉप से पहले डाउनलोड की गई डॉक्यूमेंट्री को सामूहिक रूप से देखा। भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी एबीवीपी ने इस स्क्रीनिंग की निंदा करते हुए भारत की छवि खराब करने का आरोप लगाया है। इधर छात्रों ने आरोप लगाया है कि उन पर एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने पत्थर फेंके।
मदरसों की जांच
हिन्दुस्तान की पहली खबर है: बिहार के 2459 मदरसों की जांच कराने का आदेश। पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को 29 नवंबर, 1980 के बाद राज्य सरकार से अनुदानित 2459 मदरसों की जांच का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने तुरंत सभी डीएम के साथ बैठक कर उनके संसाधनों की जांच करने को कहा। जांच पूरी होने तक 609 मदरसों को अनुदान न देने का आदेश भी दिया। साथ ही जाली कागजात पर मदरसों को दी गई मान्यता को लेकर दर्ज प्राथमिकी के संबंध में डीजीपी को जांच की पूरी जानकारी कोर्ट को देने का भी फरमान सुनाया। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय करोल और पार्थ सारथी की पीठ ने सीतामढ़ी के मो. अलाउद्दीन बिस्मिल की अर्जी पर यह आदेश दिया। आवेदक के अधिवक्ता राशिद इजहार का कहना था कि फर्जी कागजात के आधार पर खुले मदसरों को भी अनुदान दिया जा रहा है। इसपर कोर्ट ने 2459 मदसरों की जांच का आदेश दिया।
जजों की खुफिया रिपोर्ट का मामला
हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिशें दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नामों के बारे में आईबी और रॉ की रिपोर्ट के सार्वजनिक किए जाने पर कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने एतराज जताया है। जागरण की सबसे बड़ी खबर यही है। हिन्दुस्तान ने लिखा है: जजों की नियुक्ति प्रशासनिक मामला, न्यायिक नहीं: रिजिजू। जागरण के अनुसार रिजिजू ने कहा: खुफिया एजेंसियों के अधिकारी गोपनीय ढंग से काम करते हैं और उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती है तो भविष्य में रिपोर्ट भेजने से पहले दो बार सोचेंगे। श्री रिजिजू का कहना है कि जजों की नियुक्ति का मामला प्रशासनिक है। इनका न्यायिक आदेशों और फैसलों से कोई लेना देना नहीं है।
सोने की कीमत: घटेगी या बढ़ेगी?
भास्कर की सबसे बड़ी सुर्खी है: सोने की ‘चाल’… दुनिया में कीमतें घटेंगी पर देश में बढ़ने के आसार। अखबार लिखता है: सोने के स्वर्णिम सफर को लेकर जेहन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये किस दिशा में जाएगा? महंगा होगा या सस्ता? दुनिया के विश्लेषक मानते हैं कि इंटरनेशनल मार्केट में इस साल सोने की कीमत 22% तक घट सकती है। वहीं देश के बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक सोना 8-10 प्रतिशत तक महंगा हो सकता है। दाम घटने का कारण यह बताया जा रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में गोल्ड माइनिंग अक्टूबर दिसंबर में 12% तक बढ़ी है और अमेरिका, यूरोप और चीन में सोने की खपत घटने के आसार हैं। दाम बढ़ने के लिए यह कहा जा रहा है की मंदी का डर है और यूक्रेन युद्ध भड़कने से बाज़ार गिरेंगे तो सोने की मांग बढ़ जाएगी।
उपेंद्र कुशवाहा का बयान और नीतीश का सिरदर्द
हिन्दुस्तान की दूसरी सबसे बड़ी खबर है: उपेंद्र कुशवाहा के बयान से कोई लेना-देना नहीं: नीतीश। भास्कर ने लिखा है: जिसको हम पार्टी में बढ़ाते हैं, वह भागने की कोशिश करता है: नीतीश। अखबारों के अनुसार: जदयू के राष्ट्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के ताबड़तोड़ बयानबाजी और विद्रोही तेवर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो टूक कहा है कि उनके बयानों से हमें कोई लेना-देना नहीं। उनके मन में जो आ रहा है, वे बोल रहे हैं। नीतीश कुमार ने ये बातें मंगलवार की सुबह जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर माल्यार्पण के बाद विधानमंडल परिसर में पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहीं। एक दिन पूर्व जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ललन ने भी उपेंद्र कुशवाहा के बयान को खारिज करते हुए कहा था कि जदयू का कोई भी नेता भाजपा के संपर्क में नहीं है। उधर, बापू सभागार में जदयू अतिपिछड़ा प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित कर्पूरी ठाकुर जयंती समारोह में मुख्यमंत्री ने उपेंद्र कुशवाहा का नाम लिये बगैर कहा कि कोई आ भी जाता है, चला भी जाता है। किसी को आगे बढ़ाते हैं, तो भाग जाता है। कोई भागने की कोशिश करता है। जिसको जो मन में आये करे। पार्टी का थोड़े न इससे कुछ होना है।
कुछ अन्य सुर्खियां
- भारत वन डे क्रिकेट में भी नम्बर 1
- नवादा में सरस्वती पूजा का मनमाना चंदा न देने पर दलित युवक की हत्या
- बीपीएससी: नकल करते धराए तो 5 वर्ष तक नहीं दे पाएंगे परीक्षा, पेपर अभ्यर्थियों के सामने खुलेगा
- सीवान में जहरीले पेय पदार्थ से तीन और मरे, मुजफ्फरपुर से भेजी गई थी स्पिरिट
- पहली बार ऑस्कर में नामांकित हुईं एक साथ तीन भारतीय फिल्में
- सेना के शौर्य पर कोई सवाल नहीं: राहुल
- भारत ने बनाया अपना मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम – ‘भार-ओएस’
- न्याय की सार्थक पहुंच के लिए स्थानीय भाषा में निर्णय देना जरूरी: सीजेआई
- अमेरिका में नए रोजगार को तरस रहे लाखों भारतीय आईटी पेशेवर
- उपेंद्र बोले सीएम को और कमजोर करने की साजिश की जा रही है, मुझे पार्टी के दो कार्यक्रमों में नहीं बुलाया गया मेरी गलती क्या है
अनछपी: मदरसों का बेजरूरत विरोध करना एक अलग मुद्दा है लेकिन वहां की जाने वाली धांधली बेहद गंभीर चिंता का विषय है। मदरसों में मूलतः मजहब की तालीम दी जाती है और उसके कर्ता-धर्ता से ईमानदारी की अधिक उम्मीद की जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि यह पूरा धंधा ही बेईमानी का बन गया है। फर्जी कागजात पर मदरसा दिखाकर उसके शिक्षक और दूसरे कर्मियों के नाम पर पैसे की उगाही किये जाने की शिकायत है। इसी तरह जो मदरसे सही कागजात पर बने होते हैं वहां नौकरी देने के नाम पर भी कम धामली नहीं की जाती है। यह सही है कि सभी मदरसे ऐसे नहीं है लेकिन यह भी सही है कि काफी संख्या ऐसे मदरसों की है जहां इस तरह की धांधलियां की जाती हैं। मदरसों में धांधली का एक पहलू तो यह है कि इसके चलाने वाले इसके लिए जिम्मेदार होते हैं लेकिन इसका दूसरा अहम पहलू यह भी है कि मदरसा बोर्ड की मिलीभगत के बिना ऐसी धांधली नहीं हो सकती। बिहार में मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष का पद पिछले कई महीनों से खाली है। मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष का पद वैसे तो बहुत पवित्र माना जाना चाहिए लेकिन अफसोस की बात यह है कि मदरसा बोर्ड के पिछले अध्यक्ष पर धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं। ऐसे में मदरसों के बारे में पटना हाईकोर्ट का आदेश उन सभी लोगों के लिए आंख खोलने वाला है जो इसे चलाते हैं। ख़ासकर वैसे मदरसे जहां धांधली की शिकायत नहीं है उन्हें भी सावधानी बरतने की जरूरत है। इंसाफ का तकाजा तो यही है कि ऐसी धांधली करने वाले सभी मदरसा वालों को जेल के अंदर डाला जाए।
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