बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। बिहार के सरकारी डिग्री कॉलेजों को विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण से अलग कर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाने का प्रस्ताव है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दोहराया कि विशेष SIR के दौरान किसी का नाम मतदाता सूची से हटने भर से उसकी नागरिकता खत्म नहीं हो जाती। सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस अनशन स्थल से उठाकर ले गई।
और, अगले साल से आ सकते हैं ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट।
पहली ख़बर
प्रभात खबर के अनुसार बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की तैयारी शुरू हो गयी है. राज्य सरकार आगामी मॉनसून सत्र में एक नया उच्च शिक्षा विधेयक लाने जा रही है, जिसके जरिये राज्य के लगभग 481 सरकारी डिग्री कॉलेजों को विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण से अलग कर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाने का प्रस्ताव है. यदि यह कानून लागू होता है, तो विश्वविद्यालयों की भूमिका मुख्य रूप से स्नातकोत्तर (पीजी) शिक्षा और शोध तक सीमित हो जायेगी, जबकि स्नातक (यूजी) कॉलेजों का संचालन, नियुक्तियां और प्रशासन सीधे सरकार के नियंत्रण में होगा. राज्य के 12 विश्वविद्यालयों के अधीन अंडर ग्रेजुएट कॉलेज का संचालन होता है. इन सभी विवि के अधीन कॉलेज अब उच्च शिक्षा के अधीन होगा. यानी यूजी कॉलेज अब सरकार के अधीन होंगे और पीजी व यूनिवर्सिटी का संचालन लोकभवन से होगा. स्कूल शिक्षा की तर्ज पर प्रत्येक जिले में कॉलेजों की निगरानी के लिए एक उच्च शिक्षा पदाधिकारी नियुक्त करने का भी प्रस्ताव है. यह अधिकारी जिले के सभी सरकारी डिग्री कॉलेजों की शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों की निगरानी करेगा. प्रस्तावित कानून में शिक्षकों के लिए भी कई नये प्रावधान किये गये हैं. कॉलेज शिक्षकों को किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने या किसी राजनीतिक विचारधारा का सार्वजनिक समर्थन, प्रचार अथवा लेखन करने की अनुमति नहीं होगी.
वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
भास्कर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दोहराया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान किसी का नाम मतदाता सूची से हटने भर से उसकी नागरिकता खत्म नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा, निर्वाचन आयोग नागरिकता तय करने वाला प्राधिकरण नहीं है। नाम सूची से हटाने पर आयोग को नागरिकता कानून के तहत निर्णय के लिए मामला केंद्र को भेजना होगा। यह प्रक्रिया पूरी होने तक, नागरिकता खत्म नहीं हो सकती। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ प. बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए लोगों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याची की ओर से कहा गया कि अपीलों पर फैसले से पहले ही मतदाता सूची से बाहर किए लोगों को सरकारी राशन और जाति प्रमाणपत्र जैसी सुविधाओं से वंचित कर रहे हैं। पीठ ने आयोग, बंगाल सरकार से जवाब मांगा है। केस 25 अगस्त को सूचीबद्ध किया है। सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर कमेटी के चेयरमैन प्रसेनजीत बोस ने दायर की थी।
स्कूल शिक्षकों के ट्रांसफर के लिए एप्लीकेशन 29 से
हिन्दुस्तान के अनुसार बिहार में शिक्षकों के तबादले का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल 29 जुलाई से खुल जाएगा। पहले चरण में शिक्षक 29 जुलाई से 5 अगस्त तक आवदेन कर सकेंगे। फिर 17 से 23 सितंबर तक आवेदन का मौका मिलेगा। स्थानांतरण की सारी प्रक्रिया 31 अक्तूबर तक पूरी कर ली जाएगी। विभाग ने शिक्षकों को तीन श्रेणी में बांटते हुए अलग-अलग आवदेन की तारीखें तय की हैं। शिक्षा विभाग ने शुक्रवार को इसकी अधिसूचना जारी कर दी। साथ ही राज्य शिक्षक स्थानांतरण नियमावली, 2026 के तहत शिक्षकों के स्थानांतरण की प्रक्रिया के लिए विस्तृत समय-सारिणी भी जारी कर दी गई है। अधिसूचना के मुताबिक शिक्षकों के समायोजन, समानुपातीकरण और पारस्परिक स्थानांतरण तथा सामान्य स्थानांतरण की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी की जाएगी।
सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस अनशन स्थल से उठाकर ले गई
बीबीसी के अनुसार सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को शनिवार तड़के जंतर-मंतर से हटाकर हॉस्पिटल ले जाया गया. नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़ उनकी भूख हड़ताल 21वें दिन में प्रवेश कर गई है. पिछले 20 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया है. जंतर-मंतर पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है. पूरे वाक़ये पर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बताया कि वह थोड़ी देर के लिए धरना स्थल से बाहर गए थे.उन्होंने बताया, ”जब मैं यहाँ से सुबह सात बजे फ़्रेश होने के लिए निकला तभी पुलिस के लोग आए और सोनम सर को घसीटकर ले गए. भूख हड़ताल पर बैठे 60 साल के शख़्स को पुलिस जबरदस्ती ले गई. हमें नहीं पता कि वो उनको लेकर कहाँ गई. जब मैं अपने दोस्त के घर से जंतर-मंतर की ओर आ रहा था, तभी मुझे ख़बर मिली की सोनम सर को पुलिस ले गई.”
अमेरिकी हमले में भारतीय निवेश वाले ईरानी चाबहार बंदरगाह का टावर गिरा
हिन्दुस्तान के अनुसार अमेरिका ने शुक्रवार को लगातार छठी रात ईरान पर हवाई हमले किए, जिनमें भारत के सहयोग से संचालित चाबहार बंदरगाह का कंट्रोल टावर क्षतिग्रस्त हो गया। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया कि चाबहार बंदरगाह के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल, जिसका संचालन भारत करता है, उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने शुक्रवार को निगरानी टावर के ढहने की तस्वीर एक्स पर साझा की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने कहा कि चाबहार बंदरगाह पर हमले की कुछ सूचना सामने आई हैं, लेकिन टर्मिनल को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
अगले साल से आ सकते हैं ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट
भास्कर के अनुसार में अगले साल से प्लास्टिक के नोट चलन में आ सकते हैं। शुरुआत 10 और 20 रुपए के छोटे नोटों से होगी। भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्रा. लि. की बेंगलुरु इकाई ने ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट शीटों की आपूर्ति के लिए दुनियाभर की कंपनियों से निविदाएं आमंत्रित की हैं। यह टेंडर 18 अगस्त को खुलेगा। देश में प्लास्टिक नोट की शीट बनाने वाली कंपनियां नहीं हैं। हाल ही में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि 10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों का प्रस्ताव विचाराधीन है। इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने पर स्टडी चल रही है। पटना-मुंबई में हुई आरबीआई की बोर्ड मीटिंग में इस पर चर्चा हुई थी।
कुछ और सुर्खियां:
- मुजफ्फरपुर-पूसा एनएच किनारे नाला निर्माण के लिए गड्ढा खोदने के दौरान पीएनजी पाइपलाइन फटी, सात छात्राएं और दो शिक्षिका बेहोश
- बिहार के 131 करोड़ के बालू घोटाले में पटना और बांका में ईडी की छापेमारी
- बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए जन सुराज पार्टी को मिला स्कूल का बस्ता चुनाव चिन्ह
- संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से, सात विधायक पेश होंगे
- राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने आईजीआईएमएस में जांच कराई, लो ब्लड प्रेशर के बाद डॉक्टरों ने दिल्ली जाने की सलाह दी
- महान क्रिकेटर वेस्टइंडीज के गैरिसन बस का 89 साल की उम्र में निधन
- भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया
अनछपी: बिहार में उच्च शिक्षा में जो बदलाव लाए जा रहे हैं वह दरअसल इस लिहाज से बेहद चिंताजनक हैं कि सरकार न केवल कॉलेजों पर नियंत्रण चाहती है बल्कि वहां पढ़ा रहे शिक्षकों को भी पूरी तरह चुप कराना चाहती है। हाल में ही जिन 211 प्रखंडों में नए डिग्री कॉलेज खोले गए हैं उनकी बदहाली का अंदाजा तो सरकार के अंदर के लोगों को भी है, हालांकि वह मानेंगे नहीं। पहली बात तो यह कि केवल 6 विषयों की पढ़ाई की मंजूरी उन कॉलेजों को मिली है जिनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि वह वहां मौजूद किसी स्कूल के कोने में खोल दिए गए हैं। वहां शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई है बल्कि दूसरे कॉलेज से डेपुटेशन पर भेजे गए हैं और वह भी सभी छह विषयों में नहीं, कहीं दो कहीं तीन, इस तरह से यह खानापुरी की गई है। अब यह बताया जा रहा है कि जो डिग्री कॉलेजों विश्वविद्यालय से जुड़े थे, अब उन्हें सीधे सरकार अपने नियंत्रण में ले लेगी। सरकार ऐसा क्यों करना चाहती है उसे इसका कारण भी बताना चाहिए। एक वाक्य में कहा जाए तो दरअसल सरकार बीमारी की जगह बीमार को ही खत्म करना चाहती है। इन कॉलेजों के ऊपर जिला स्तर पर नियुक्त किए गए एक अधिकारी का नियंत्रण होगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कॉलेजों के शिक्षकों को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होगी क्योंकि उनसे राजनीति में हिस्सा लेने या राजनीतिक बयान देने का अधिकार छीना जा रहा है। एक तरह से देखा जाए तो उच्च शिक्षा समुदाय पर सरकार और अधिकारियों का नियंत्रण होने जा रहा है लेकिन विश्वविद्यालय के शिक्षकों की तरफ से आंदोलन की कोई सुगबुगाहट नहीं है।
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