बिहार में 171 का क़त्लेआम, लेकिन अदालतों को नहीं मिले नरसंहारों के गुनहगार

सैयद जावेद हसन, बिहार लोक संवाद डाॅट नेट पटना

बिहार में पिछले 25 साल के दौरान 5 बड़े नरसंहार हुए हैं। इनमें 171 लोगांें की जान चली गई। लेकिन अदालत के सामने कोई एक व्यक्ति हत्यारा साबित नहीं हुआ और एक-एक कर तमाम आरोपी बरी कर दिए।

इन नरसंहारों का बीज 90 के दशक में बोया गया था। तब बिहार जातीय संघर्ष से जूझ रहा था। सवर्ण और दलित जातियों में खूनी जंग चल रही थी। ज़मीन-जायदाद को लेकर ऊंची और नीची जातियां एक-दूसरे के खून के प्यासे थे।

उसी दौरान बथानी नरसंहार हुआ। 1996 में भोजपुर ज़िले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई। साल 2012 में पटना हाईकोर्ट ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को बरी कर दिया। हालांकि निचली अदालत ने तीन अभियुक्तों फांसी और 20 अभियुक्तों को आजीवास कारावास की सज़ा सुनाई थी।

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार अरवल ज़िले में 30 नवंबर 1997 की रात को हुआ नृशंस हत्याकांड था। इसमें कथित रणवीर सेना ने 58 लोगों की हत्या कर दी थी जिसमें बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल थीं। ये सभी दलित थे। पटना की विशेष अदालत ने 7 अप्रील 2010 को 16 दोषियों को फांसी और 10 को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी। लेकिन पटना हाई कोर्ट ने 9 अक्तूबर, 2013 को सुनाए गए अपने फ़ैसले में सभी दाषियों को बरी कर दिया।

जहानाबाद में शंकर बिगहा नरसंहार हुआ था जिसमें 25 जनवरी 1999 की रात 22 दलितों की हत्या कर दी गई थी। घटना के 16 साल बाद 13 जनवरी, 2015 को जहानाबाद ज़िला अदालत ने अपना फ़ैसला सुनाया। अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 24 अभियुक्तों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया। यह शायद पहला मामला था जिसमें तमाम मुल्ज़िमीन निचली अदालत से ही बरी कर दिए गए।

जहानाबाद ज़िले में ही 18 मार्च, 1999 की रात सेनारी नरसंहार हुआ। इसमें भूमिहार जाति के 34 लोगों की रात के अंधेरे में हत्या कर दी गई थी। उस रात सेनारी गांव में पांच- छह सौ लोग घुस आए और 40 मर्दों को घरों से खींच-खींच कर गांव के बाहर ले गए। फिर लाइन में खड़ा करके बारी-बारी से सबका गला काट दिया गया और पेट चीर दिया। इनमें से 6 किसी तरह बच गए थे। सेनारी नरसंहार को अरवल ज़िले के लक्ष्मणपुर बाथे और जहानाबाद ज़िले के शंकर बिगहा नरसंहारों को बदला माना गया था।
सेनारी नरसंहार जहानाबाद ज़िला अदालत ने 15 नवंबर, 2016 को 10 अभियुक्तों को मौत जबकि 3 को उम्रक़ैद की सुनाई थी। लेकिन 21 मई, 2021 को पटना हाई कोर्ट ने तमाम अभियुक्तों को बरी कर दिया। जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह और जस्टिस अरविंद श्रीवास्तव की बेंच ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि घटना अमावस की अंधेरी रात को हुई थी और गांव में रौशनी की कमी थी। चश्मदीद ने टाॅर्च की रौशनी में आरोपियों को पहचानने का दावा किया लेकिन दावा कमज़ोर और संदेहास्पद माना गया क्योंकि आरोपी गवाहों के गांव के नहीं थे। इसके अलावा, कोर्ट में आइडेंटीफ़ाई करने से पहले कभी भी आरोपियों का कोई टेस्ट आइडेंटीफ़िकेशन परेड नहीं कराया गया था।

अब चलते हैं मियांपुर नरसंहार की तरफ़। 16 जून, 2000 को औरंगाबाद ज़िले क मियांपुर में 35 दलितों की हत्या कर दी गई। लेकिन जुलाई 2013 में पटना हाई कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से 9 को बरी कर दिया।

सवाल यह है कि जाति आधारित नरसंहारों के मामले में अदालतों के फ़ैसले क्यों इतने चैंकाने वाले होते हैं? क्या अभियुक्तों को सज़ा दिलाने या बरी कराने में तत्कालीन सरकारों की कोई भूमिका होती है? या हमारा पुलिस और जांच तंत्र ही इतना निकम्मा है कि उसे मक़तूलों का काई क़ातिल नहीं मिलता?

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