छपी-अनछपीः नीतीश मंत्रिमंडल में 12 को पहली बार मौका, अब तलाक-ए-हसन पर सुप्रीम कोर्ट में बहस

बिहार लोक संवाद डाॅट नेट, पटना।
बिहार की नयी महागठबंधन सरकार के मंत्रिमंडल का मंगलवार को विस्तार हुआ। यही खबर सभी हिन्दी अखबारों में छायी हुई है। तीन तलाक कानून के बाद अब तलाक-ए-हसन ने यानी तीन माह में तीन तलाक देने के इस्लामी नियम पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू हुई है। यह खबर भी आज प्रमुखता से छपी है।
नये मंत्रिमंडल में जाति-समुदाय का समन्वय करने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद विवाद हो ही गया है। मंत्रिमंडल में पांच अल्पसंख्यक शामिल हैं। पहला विवाद तो भूमिहार बिरादरी के प्रतिनिधित्व पर है। सबसे अधिक मंत्री यादव समुदाय से हैं। दूसरा ऐतराज मुसलमानों को दिये गये विभागों जैसे- आपदा प्रबंधन और गन्ना उद्योग पर है। इस अंदरूनी विवाद के साथ यह आरोप भी लगा है कि मंत्रियों में कई दबंग भी शामिल हैं।
हिन्दुस्तान की हेडलाइन हैः शपथ ग्रहणः 12 पहली बार बने मंत्री। इसमें यह जानकारी भी दी गयी है कि मिथिलांचल, मगध और शाहाबाद पर मेहरबानी की गयी है और पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग के सर्वाधिक 15 मंत्री बनाये गये हैं।
प्रभात खबर की सबसे बड़ी सुर्खी हैः महागठबंधन सरकार मंे 31 मंत्री बने, जदयू को वित्त, तो राजद को शिक्षा, पथ व स्वास्थ्य। इसमें यह बताया गया है कि सरकार में वामपंथी दल शामिल नहीं हैं जबकि तीन महिलाओं को मंत्रिमंडल में जगह दी गयी है।
जागरण की सुर्खी हैः नीतीश मंत्रिमंडल में 31 नये मंत्री, तेजस्वी को बड़े विभाग। जागरण की ही खबर हैः भाजपा का बिहार में 35 सीट जीतने का लक्ष्य। यह भाजपा की 2024 लोकसभा चुनाव की तैयारी का संकेत है। दूसरी ओर प्रभात खबर की सूचना यह हैः प्रदेश भाजपा मंे होगा सांगठनिक बदलाव।
भास्कर की सुर्खी बड़ी सांकेतिक हैः तारकिशोर+मंगल+नितिन=तेजस्वी। यानी तेजस्वी को इन तीनों पूर्व मंत्रियों के बराबर विभाग दिये गये हैं।
भाजपा अब महागठबंधन पर केन्द्रीय एजेंसियों के जरिए शिकंजा कसने की तैयारी तेज कर रही है। इस कड़ी में हिन्दुस्तान में पहले पेज पर छपी खबर अहम है जिसकी सुर्खी हैः आईआरसीटीसी घोटाले की जल्द सुनवाई के लिए अर्जी। इसमें मौजूदा उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और लालू-राबड़ी भी आरोपित हैं। इसी मामले को लेकर 2017 में नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हुए थे। इस मामले में चार्जशीट दाखिल किये चार साल हो गये हैं लेकिन सीबीआई अब तेजी दिखा रही है।
आरोप-प्रत्यारोप के बीच जदयू के वरिष्ठ नेता उपेन्द्र कुशवाहा ने भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी से पूछा है कि वे बताएं कि कितने वीसी अति पिछड़ा वर्ग से नियुक्त किये गये हैं। यह खबर भी प्रमुखता से छपी है।
अनछपीः तीन तलाक यानी तलाके बिदअत सुप्रीम कोर्ट से पहले ही अवैध करार दिया जा चुका है। इस बारे में केन्द्र सरकार सजा देने का कानून भी बना चुकी है। अब ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट में गाजियाबाद की एक मुस्लिम महिला ने अर्जी देकर आरोप लगाया है कि तलाक-ए-हसन आधुनिक मानवाधिकारों के अनुरूप नहीं है और यह इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इस मामले में जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की बेंच ने कहा है कि पहली नजर में तलाक-ए-हसन अनुचित नहीं है। इस मामले में अगली सुनवाई 29 अगस्त को होगी। तलाक के मामले में इस्लामी कानून को बार-बार कोर्ट और राजनीति का विषय बनाया जाना शोचनीय बात है। यह बात भी खतरनाक है कि हर मामले में अनिवार्यता की दलील दी जाती है। जिस कानून ने तलाक की परिकल्पना दी है, उसे मानने वाले की तरफ से ही ऐसे सवाल उठाना वास्तव में इस बात का स्पष्ट उदाहण है कि मुस्लिम समाज इस्लामी शिक्षा के तार्किक पहलुओं से अपने सदस्यों को आगाहा करने मंे नाकाम है। ऐसे में कोर्ट और नेताओं को हस्तक्षेप करने का मौका मिलता है।

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