छपी-अनछपी: 43 वर्षों के बाद अप्रैल में पारा 44℃ पर, कॉमन सिविल कोड की फिर सुगबुगाहट

बिहार लोक संवाद डॉट नेट, पटना। गर्मी की शिद्दत हर जगह बड़ी सुर्खियों में है। कॉमन सिविल कोड की सुगबुगाहट फिर तेज़ हो रही है। इस बारे में भास्कर में ख़ास खबर है। समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में जारी बहस की खबर भी प्रमुखता से छपी है। इसके अलावा एक्सिडेंट के दावों के निपटारे के लिए ज़िलों में ट्रिब्यूनल बनाने की घोषणा भी अहम खबर है।

जागरण की सबसे बड़ी सुर्खी है: 43 वर्षों के बाद राजधानी का तापमान 44 पर पहुंचा। हिन्दुस्तान ने लिखा है; गर्मी का सितम: पटना में 43 साल बाद अप्रैल में पारा 44 डिग्री के पार पहुंचा। पटना सहित राज्य के अधिकतर जिले मंगलवार को भीषण गर्मी की चपेट में रहे। 18 जिलों में हीट वेव (लू) या प्रचंड हीट वेव का असर रहा। वहीं पटना में अप्रैल महीने में गर्मी का 43 साल पुराना रिकॉर्ड टूट गया। मंगलवार को यहां का अधिकतम तापमान 44.1 डिग्री सेल्सियस रहा। इससे पहले अप्रैल महीने में सर्वाधिक अधिकतम तापमान 29 अप्रैल 1980 में 44.6 डिग्री दर्ज किया गया था।

कॉमन सिविल कोड की चाल
भास्कर की एक अहम सुर्खी है: चुनाव के बीच कॉमन सिविल कोड पर बैठकें तेज़। अखबार लिखता है कि बहुप्रतीक्षित कॉमन सिविल कोड को लेकर केंद्र सरकार में बैठकों का दौर अचानक तेज हो गया है। बताया जा रहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सोमवार को हुई बैठक में इस पर आगे बढ़ने का फैसला लिया गया। कानून अध्यादेश के जरिए लाया जाए या संसद में पारित कराया जाए इस पर मंथन जारी है। इस बीच बुधवार को राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक हो रही है। मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल में कॉमन सिविल कोर्ट पर काम करती रही है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती धार्मिक विविधताओं और रिवाज के अलावा 12 करोड़ आदिवासियों को लेकर है जिन्हें इसके दायरे में लाना होगा।

एक्सिडेंट के दावे के लिए ज़िलों में ट्रिब्यूनल
हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी खबर है: दुर्घटना दावे के निपटारे को जिलों में बनेगा ट्रिब्यूनल। सड़क वाहन दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु अथवा घायल होने की स्थिति में उसके दावे के निपटारे के लिए हर जिले में अब ट्रिब्यूनल होगा। ट्रिब्यूनल के निर्णय पर ही सबंधित व्यक्ति और परिवार को मुआवजे का भुगतान होगा। अब तक राज्यस्तर पर एक ही ट्रिब्यूनल की व्यवस्था थी। हर जिले में ट्रिब्यूनल होने से वहां दावा दर्ज करने और कम समय में मुआवजा प्राप्त करने में सुविधा होगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में इसकी मंजूरी दी गई। कुल 11 प्रस्तावों पर सहमति कैबिनेट ने दी।

समलैंगिक विवाह पर बहस
जागरण ने पहले पेज पर खबर दी है: सरकार ने कहा समलैंगिक विवाह को मान्यता विधायिका का अधिकार क्षेत्र। भास्कर की सुर्खी है: यह संसद का मुद्दा, इसे नहीं सुनें: केंद्र, फैसला करना हमें न बताएं: सीजेआई। हिन्दुस्तान ने लिखा है: समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का आग्रह करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई शुरू हो गई। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पांच वर्षों में चीजें बदली हैं। हमारे समाज ने समलैंगिक संबंधों को स्वीकार किया है। बता दें कि 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था। केंद्र सरकार ने जताई आपत्ति सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि क्या अदालत इस विषय पर सुनवाई कर सकती है। पहले इस पर अनिवार्य रूप से ससंद में चर्चा कराई जाएगी। केंद्र ने साथ ही इस मामले में राज्यों को पक्ष बनाने की मांग भी उठाई।

जातीय गिनती पर स्टे लगाने से इनकार
हिन्दुस्तान ने पहले पेज पर खबर दी है: जातीय गणना पर रोक के अंतरिम आदेश से हाई कोर्ट का इनकार। बिहार में जाति आधारित गणना के दूसरे चरण पर रोक लगाने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया है। इस संबंध में राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की 7 मार्च 2023 को जारी अधिसूचना रद्द करने को लगभग आधा दर्जन याचिकाएं पटना हाईकोर्ट में दायर की गई हैं। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन व न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद की खंडपीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई की। इससे पहले आवेदक की ओर से सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील अपराजिता सिंह सहित हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय सिंह, दीनू कुमार, रीतिका रानी, धनंजय कुमार तिवारी, एमपी दीक्षित सहित कई वकीलों ने अपनी-अपनी याचिका पर पक्ष रखना चाहा, लेकिन कोर्ट ने सभी मामलों पर 4 मई को सुनवाई करने का आदेश दिया।

बिलकीस बानो के दोषियों को क्यों छोड़ा?
भास्कर की एक अहम सुर्खी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है: दोषियों को क्यों छोड़ा? आज बिलकीस बानो हैं, कल आप और हम हो सकते हैं। बिलकीस बानो गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गुजरात सरकार से जवाब तलब किया। कोर्ट ने तल्ख तेवर के साथ पूछा कि दोषियों को सजा से पहले क्यों छोड़ा? आज यह बिलकीस बानो के साथ हुआ, कल आप या हम भी हो सकते हैं। जस्टिस केएम जोसफ और बीवी नागरत्ना की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि जब समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने वाले ऐसे जघन्य अपराधों में छूट देने पर विचार किया जाता है तो सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। इस केस के दोषियों की रिहाई के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 2 मई को अंतिम सुनवाई करेगा।

कुछ और सुर्खियां
● अतीक हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट में 24 अप्रैल को सुनवाई होगी
● कीर्ति चिदंबरम पर कार्रवाई, 11 करोड़ की संपत्ति कुर्क
● जमुई के चकाई में कर्मियों को बंधक बनाकर बैंक से सोलह लाख लूटे
● 4 वर्षीय B.Ed. के लिए आवेदन कल से, परीक्षा 27 मई को
● आईटीआई में 2216 नियमित इंस्ट्रक्टर बहाली की वैकेंसी मई तक
● जदयू के पास 71 करोड़, ईडी- सीबीआई जांच में घिरा राजद नेतृत्व, पर पार्टी खाते में ‘शून्य’, 752 करोड़ की भाजपा की राज्य इकाई के कोष में सिर्फ 51 लाख

अनछपी: भारतीय जनता पार्टी इस समय कर्नाटक के चुनाव में बुरी तरह फंसी हुई है और अगले साल के लोकसभा चुनाव के लिए उसकी तैयारी भी बहुत मजबूत नहीं दिखती है। बिहार में नीतीश कुमार के साथ उसका गठबंधन टूटने के बाद से हिंदी प्रदेशों में उसकी स्थिति कमजोर ही हुई है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर कोई ऐसा बड़ा मुद्दा चाहिए जिस पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हो सके। चूंकि राम मंदिर का मुद्दा ठंडा पड़ चुका है, इसलिए उसके पास दूसरा हथियार कॉमन सिविल कोड का बचा है। कॉमन सिविल कोड पर भारतीय जनता पार्टी अब हड़बड़ी में नजर आती है क्योंकि उसने अध्यादेश लाकर भी कोड को लागू करने का विकल्प खुला छोड़ रखा है। संसद में चर्चा के बाद कॉमन सिविल कोड लाना उसके लिए इतना आसान नहीं होगा और ध्रुवीकरण का मुद्दा भी हाथ से जाता रहेगा। इसलिए यह संभव है कि भारतीय जनता पार्टी अध्यादेश से कॉमन सिविल कोड लाए और समाज में एक बार फिर बयानबाजी का दौर शुरू हो जाए जिससे उसे धार्मिक ध्रुवीकरण करने में आसानी हो। कॉमन सिविल कोड का सबसे ज्यादा विरोध मुसलमानों की ओर से किया जाता है लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि इससे देश के 12 करोड़ आदिवासी भी प्रभावित होंगे। भारतीय जनता पार्टी की कोशिश होगी कि आदिवासियों के विरोध को कुछ आगे पीछे कर निपटा दिया जाए और असली बहस हिंदू बनाम मुसलमान का हो जाए। यह तो हुई भारतीय जनता पार्टी की तैयारी की बात। देखना यह है कि जो दूसरे राजनीतिक दल हैं, वह इस चाल का कैसे मुकाबला करते हैं। इसके साथ यह भी देखना होगा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड जैसी संस्था इसे किस रूप में लेती है। भारतीय जनता पार्टी अगर कॉमन सिविल कोड को ध्रुवीकरण का मुद्दा बनाने में कामयाब होती है तो यह बाकी दलों के लिए घोर निराशा की बात होगी।

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